दिल्ली दोहावली
दिल्ली ने पैदा किया, बड़े
बड़े धनवान।
हैं बहुत से ऐसे भी, करें धरम में दान।
सज्जन लोग
दिल्ली के, खूब निभाते धर्म।
राह विकास की ले
जाने, करते अपना कर्म।
दिल्ली वाले
जानते, धर्म बिना सब व्यर्थ।
डगर धर्म के
अग्रसर, हो ना ताकि अनर्थ।
स्वतंत्रता
संग्राम में, इंद्रप्रस्थ का योग।
प्रतिष्ठा की
रक्षा में, दिए प्राण तक लोग।
कमाई करने ज्यादा, चले गए परदेश।
सस्ती में मस्ती मिले, आकर अपने देश।
मन विदेश लगता
नहीं, जा दिल्ली से दूर।
अपनापन अरु सुख
कहाँ, चाहे धन भरपूर।
गए जो परदेश कई, ढूंढें आकर मूल।
कुछ कुछ यादें रह गयीं, शेष गयीं सब भूल।
संसार में कहीं रहें, दिल्ली आती याद।
शॉपिंग का वैसा मजा, और कहाँ वह स्वाद।
रे दिल्ली मैं
क्या कहूँ, तुझसे रहकर दूर।
स्वाद बिन उन
ढाबों के, रहने को मजबूर।
तेरी छटा बसंत
में, भांति भांति के फूल।
उद्यानों मध्य
विचरना, कैसे जाएँ भूल!
प्यार दी जो दिल्ली तू, है ना कोई मोल।
गाते सभी विदेश
में, पीट पीट कर ढोल।
और कहाँ है जगत
में, दिल्ली में जो बात।
चहचहाता रहता
दिन, जगमग करती रात।
दिल्ली छोड़ चले
गए, महानुभाव विदेश।
कहाँ मिले जो
चाहते, वैसा ही परिवेश।
जो भी आया अंक
में, खूब लुटाई प्रीत।
दूर जाकर के
दिल्ली! गाया तेरे गीत।
बहुत कठिन है
भूलना, दिल्ली तेरा प्यार।
संभव न अन्यत्र
मिले, तुझसा मिला दुलार।
दिल्ली तुझको
छोड़कर, गये कहीं भी और।
वैसा ना साधन
मिला, अन्य किसी भी ठौर।
दिल्ली तुझसे
दूर रह, दिल रहता बेचैन।
काटे से कटता
नहीं, दिन हो चाहे रैन।
दिल्ली तुझसे
दूर हो, हमें हुआ एहसास।
खोया क्या ऋतु शिशिर में, क्या खोया मधुमास।
दिल्ली जाते छोड़ क्यों? उठता बड़ा सवाल।
पालती है सबको ये, जैसे अपना लाल।
दिल्ली
तुझसे दूर रह, जीवन लगता सून।
कमाई
यहाँ भी मगर, मिलता नहीं सुकून।
भाग्यशाली दिल्ली से, जुड़े रहें जिन्ह तार।
इच्छा जब चले आओ, जब मन सीमा पार।
दिल्ली से बढ़कर नहीं, जग में
कोई नगर।
अमीर गरीब सभी का, हो जाता
है बसर।
दिल्ली रहती
दौड़ती, कहाँ सुबह से शाम।
लगी परिश्रम में अथक, मिले तनिक आराम।
दिल्ली में आये कई, बिलकुल खाली हाथ।
धन कुबेर वो बन गए, पा किस्मत का साथ।
दिल्ली
के ही अंक में, राष्ट्र के अध्यक्ष।
न्याय, विधि अरु अधिशासी, सत्ता शीर्ष समस्त।
दिल्ली आते बहुत से, अजमाने को भाग।
धैर्य विवेक धरे जो, किस्मत जाती जाग।
जीवन
जीने की कला, दिल्ली में बहुरंग।
भांति बड़े व्यवसाय के, विविध काम के ढंग।
दिल्ली
में वर्चस्व पर, सब के सब त्यौहार।
लोगों
में उत्साह गजब, और मधुर व्यवहार।
छोटा
एक दिल्ली में, बसता हिंदुस्तान।
इन्द्रधनूषी
रंग में, रखती अद्भुत शान।
बदल
गयी दिल्ली बहुत, बदले इसके ढंग।
समय
के संग यह रही, नित्य बदलते रंग।
अब भी चलता बसों में, पांच टके का टिकट।
दस रुपये में इरिक्शा, जाना यदि हो निकट।
मिलती कहाँ विदेश में, नुक्कड़ वाली चाय।
गरम गरम ताजा बनी, देख जिया ललचाय।
भारत सोने का विहग, दिल्ली
उसकी चोंच।
आये विदेशी डाकू, पंख ले गए नोच।
दिए लाकर दिल्ली
को, संवारकर जो लोग।
याद रखना धरम परम, उनका अनुपम योग।
दिल्ली ने हमको दिया, ज्ञान रत्न अनमोल।
भाग दौड़ बेशक मगर, जीवन करे कलोल।
सिखाती हमको दिल्ली, सदा नीति की बात।
कर्म धर्म का पालना, होय तुम्हारे हाथ।
आपाधापी है मगर, दिल्ली में आराम।
दिन कर लो काम डटकर, शाम आपुनो राम।
बसंत में उपवन खिले, खुश
बागों में भ्रमर।
कोयल तो गाती नहीं, फुसफुस करते
युगल।
भक्ती खूब दिल्ली में, लेकिन अपना ध्यान।
देने से फिर क्या लाभ,
परमारथ का ज्ञान।
कनाट प्लेस साँझ पहर, जुट जाती
है भीड़।
होती है व्यापार की, और प्यार
की डील।
मनुष्य करता है
वही, रोके वेद पुराण।
अक्ल उसे आती
तभी, संकट में हो प्राण।
करना धरना ना
पड़े, मिलता रहे हराम।
बहुतों की चाह
हड़पना, हृदय भजे ना राम।
भौतिकता के दलदल
में, मनुज हो रहा भ्रष्ट।
पाता जितना
आराम, उससे ज्यादा कष्ट।
सबसे बड़ी
बीमारी, फैला भ्रष्टाचार।
नागरिक को मिले
नहीं, मूलभूत अधिकार।
अधिक कमाने की होड़, करे सोच को तंग।
धन पाने की लालसा, शान्ती करती भंग।
रावण के पुतले दहन, दिल्ली में हर साल।
रावण वाले पर कई, करते बड़े कमाल।
चुनाव जीत जाने पर, होती तनिक न देर।
नेता के कैसे लगें, झट से हाथ कुबेर।
राजनीति का खेल भी, ज्यों क्रिकेट का मैच।
जाने कब छक्का लगे, जाने कब हो कैच।
क्यों चाहेंगे देश में, चल पाए गणतंत्र।
जो चाहे कर लेते, उनका अपना तंत्र।
रहता नहीं इंसान का, सदा एक सा भाव।
कब हो गाड़ी नाव पर, कब गाड़ी पर नाव।
कई बार सताने लगता, धुआं व
पसरा शोर।
दूर भाग लें जी करे, भीड़ से कहीं और।
वाहन करते धुंआ से, दूषित अतिशः वायु।
दिल्ली के वासियों की, घट जाती है आयु।
आधुनिकता में सिमटा, आज
परस्पर प्यार।
सतत टूटते जा रहे, संबंधों
के तार।
कभी सोच से परे था, मोल
मिलेगा नीर।
साँस हेतु क्रय करेंगे, बोतल
भरी समीर।
कूड़ाघर को छांटते, गली गली
में स्वान।
किसी को काट ले
तभी, जूँ शासन के कान।
सुविधा के साधन हेतु, मनु का
अथक प्रयास।
जीवन यूँ ही बीतता, पूरी होय
न आस।
पुरवा ना पछुआं यहाँ, भाती कभी बयार।
कूलर एसी की हवा, बीच
दीवारें चार।
दो व्यक्ति के झगड़े में,
पुलिस उठाती लाभ।
बिल्ली बन्दर की कथा, सिखा न
पाती पाठ।
दिल्ली में भी
कर रहे, खुलकर कुछ अपराध।
कौन? जो चलने
देते, कृति उनकी निर्बाध!
प्रभावशाली
समझते, दिल्ली को जागीर।
अपने आगे और की,
अनुभव ना हो पीर।
सारे जग से यहाँ
से, चलता है व्यापार।
थोक फुटकर
दिल्ली में, अटे पड़े बाजार।
कबाड़ी कोई बनकर, कोई बना
दलाल।
दिल्ली में रह युगत से, खूब
बनाया माल।
किसी का हुआ फरेबी, सही किसी
का काम।
कुछ न कुछ कर हर कोई, कमा लेता है दाम।
जिसके पास ज्यादा धन, दिल्ली
में बलवान।
उत्तम, अगर निर्धन का, ध्यान
रखे धनवान।
पहले लेकर के रहे,
किराये का मकान।
दिल्ली ने इतना दिया,
आलय आलीशान।
दिल्ली का अपना अलग, आभासी
संसार।
कंप्यूटर पर चैट से, हो जाता
है प्यार।
छोड़
भागे अंग्रेजी, दिल्ली में अंग्रेज।
बड़े
बड़े करते रहे, हिंदी से परहेज।
धाक जमाते बहुत
से, गा अंग्रेजी गान।
हिंदी का अपमान
कर, समझें वे विद्वान।
बड़ा बन गए बेचकर, भुजिया अरु नमकीन।
धनवान कई घेरकर, सार्वजनिक
जमीन।
चलाया विश्वविद्यालय, पढ़कर
अपने गांव।
शिक्षा व्यापार बढ़िया, लग
जाने पर दाव।
अध्यापन केंद्र खोला, खुद
होकर भी फेल।
शिक्षा हुई दिल्ली में, बस
पैसे का खेल।
लक्ष्मी जी खुद जातीं, करन हेतु मनुहार।
तभी खोलतीं सरस्वती, अपने घर का द्वार।
होटल का स्वामी बना, बेचन
वाला चाय।
परिश्रम और पहुँच से, गया बढ़ाता
आय।
तांगा वाला बसों की, लगा
दिया भरमार।
किराये पर लेती अब, बस उससे
सरकार।
पैसे के पीछे कहीं, रहा नहीं
अब प्यार।
बंटवारे के कलह में, टूट रहा
परिवार।
मंहगी बिकतीं वस्तुएं,
प्रचार के आधार।
नमकीन की थैली में, बिके हवा
भर यार।
टैग तिगुनी कीमत का, देयं आध
की छूट।
ग्राहक को यह लाभ या, सीधे
सीधे लूट।
टीवी पर
विज्ञापन से, हो जाता है नाम।
थैली भर जो बेचते, क्रय करती आवाम।
कहीं सड़क पर खोल
लो, अस्थायी दुकान।
पुलिस पार्षद को
रहे, हर हफ्ते भुगतान।
नियमों की
अवहेलना, आम सड़क पर बात।
कैसे होय दिल्ली में, सुचारु यातायात!
दिल्ली
में दुर्घटना, लेती कितनी जान।
फिर
भी वाहन चालक, न होते सावधान।
सवारी पूछे
चलोगे, भइया कनाट प्लेस?
ऑटो वाला झट
कहे, जाऊंगा साकेत।
ऑटो में मीटर
लगे, चालक कहता बंद।
भाड़ा तय हो मोल से,
परस्पर रजामंद।
मानव दानव में
बंटा, सारा यहाँ समाज।
हम ऊँचा सिद्ध
करने, धर्म छोड़ जेहाद।
कहते सभी ऊँचा है, बस मेरा
ही धर्म।
बोध नहीं कि भू पे आये, करने
मानव कर्म।
दिल्ली में भी हैं कई, नहीं
धरम का भान।
राम कृष्ण तक का करें, बिना
हिचक अपमान।
बड़े बने स्टेडियम,
बालक पांय न खेल।
गलियों में ही चलाते,
कमीज पकड़े रेल।
अगस्त माह में छत पर, ले
पतंग अरु डोर।
वो लड़ी, उसका काटा, होता
रहता शोर।
रात खांय आइसक्रीम, जाय
इंडिया गेट।
इस बहाने खुली हवा, मिल जाती
कुछ देर।
सप्ताहिक बाजार में, महिलाओं की ऐश।
उनका काम चल जाता, थोड़ा भी हो कैश।
भवन तो उंचे बन गए, गली रह
गयी तंग।
सवारी आन जान में, होती रहती
जंग।
इंद्रप्रस्थ पर इंद्र जब,
होते मेहरबान।
पड़ जाती प्रशासन की, बड़ी
विपति में जान।
शिक्षा है संविधान में, सबका
ही अधिकार।
कुछ लोगों के हाथ का, शिक्षा
पर व्यापार।
संविधान में सभी को, शिक्षा मुफ्त
समान।
खुल गयी हैं बड़ी बड़ी, शिक्षा की दुकान।
जाने पर हैं देखते, निज कई अस्पताल।
रोग से बढ़ रोगी के, पल्ले कितना
माल।
तारीख पड़ती
भारी, जिनकी कम हो आय।
महँगी फीस वकील
की, कैसे पाए न्याय।
करदाता की हो खड़ी, गाड़ी का चालान।
पूछ न कोई सड़क
तक, दुकान का सामान।
दिल्ली के चालक कई, लगते बहुत अधीर।
नियम तोड़ आगे निकल, समझें खुद को वीर।
आम आदमी दौड़ता, धरे हुए
उम्मीद।
सुनवाई
होवे कहीं, मिले चैन की नींद।
युवा पीढ़ी फंस रही, ले
बैंकों से कर्ज।
आय जाय चुकाने में, कई साल
का मर्ज।
नेताओं को रह गया, बस कुर्सी
से मोह।
हित अपना साधने में, नैतिकता
से द्रोह।
आक्रांता दिल्ली पर, करने
आये राज।
ले गए संग नोचकर, धन दौलत,
बन बाज।
दो में लगा के
मिडिया, गजब दिखाती खेल।
बुलवाती और के
मुंह, अपने शब्द धकेल।
मीडिया कह स्वतंत्रता, कर देती अपमान।
दौड़ लेती पीछे सुन, काग ले गया कान।
चटनी बनाते चैनल,
खबर चटपटी पाय।
परोसते हैं तब तलक,
दर्शक छक ना जाय।
रखतें हैं
राष्ट्र सभी, दिल्ली में रुचि खास।
सब के सब बैठे
यहाँ, खोले दूतावास।
खुद रहने का ठौर
ना, रख लेते हैं कार।
खातिर खड़ी करने
की, करते नित तकरार।
भैरवनाथ के मंदिर, बहे सोमरस धार।
प्रसाद पाते भिक्षु गण, रवि को लगा कतार।
पुस्तक का मेला लगे, दिल्ली में हर साल।
भीड़ जुटती बहुत बड़ी, देखे होय निहाल।
साहित्य सृजन आजकल, चलता राम भरोस।
सोशल मीडिया पर दें, कुछ भी लोग परोस।
सोशल मिडिया कलम की, बेढंगी की चाल।
उल-जुल से साहित्य पढ़, होते लोग निहाल।
दिल्ली में घरौंदों के, छोटे अति आकार।
कैसे एक साथ रहे, बढ़ जाता परिवार।
झूठ फरेब धोखा से, कमाया धन अपार।
वही धन फिर तोड़ता, हँसा बसा परिवार।
सरेआम हरा जाता, पांचाली का चीर।
दाव लगाने में लिप्त, अर्जुन भीम प्रवीर।
गलत काम का सभी को, पड़े चुकाना मोल।
मारा जाता शेर भी, होता आदमखोर।
बन जाय जल्दी उनका, आलीशान मकान।
धन बटोरने के लिए, बेचें जो ईमान।
कमा
कमा कर रख लिए, धन संपत्ति अकूत।
चाहें
पर आगे बढ़े, आरक्षण बल पूत।
बिक जाते प्रयोग किये, दिल्ली में सामान।
कम कमाई वालों का, चलता कम में काम।
दिखता न्यून दिल्ली में, बूढ़ों का सम्मान।
वरिष्ठ खड़े मेट्रो में, नवयुव विराजमान।
महानगर में जानते, सब मतलब की बात।
संकट में भी हो नहीं, कोय किसी के साथ।
बड़े प्रयासों से हुई, साहूकारी बंद।
ऋण दे लूटें बैंक अब, लुटे जरूरतमंद।
मातु
पिता लगते यहाँ, सिर पर भारी बोझ।
धन, मन, सदन तंग सभी, होय तंग ही सोच।
दोनों
लगते एक से, चाटुकार गद्दार।
हर अवसर
पर सोचते, बस अपना उपकार।
तोड़ यातायात नियम, कई समझते शान।
डालें चालन से गलत, खतरे में वे जान।
ऐसे भी देखे यहाँ, मुंह से करते शौच।
बातों में उनके भरी, फुहड़ गाली गलौच।
दिल्ली
के समुन्दर का, मैं भी हूँ इक बूँद।
चलो नहीं
यूँ मित्र तुम, अपनी ऑंखें मूँद।
विशेषज्ञ
के काम भी, नेता ले लें हाथ।
इस तरह गुणवत्ता
से, होय यहाँ खिलवाड़।
- एस डी तिवारी
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