परिदृश्य :
बरसा घन
सावन की फुहार
हरषा मन
रिमझिम सावन
जगाया प्यार
इंद्र ने मारी
भीगी धरती
धरती धरे
सावन में नहा के
वसन हरे
गयी देखने
इंद्र की पिचकारी
भीगी सजनी
कहाँ उमंग
साजन नहीं आया
सावन आया
सावन आया
नदी बौराई
चल दी अकुलाई
पी से मिलने
चल दी अकुलाई
पी से मिलने
घेरी जो घटा
घमंडी सूरज का
गरूर घटा
घमंडी सूरज का
गरूर घटा
सोते ही रहे
दिन में भी सूरज
ओढ़े बादल
कल के दिन
कर रखा था मेघ
रवि को कैद
कर रखा था मेघ
रवि को कैद
झाँकता रहा
खिड़की से सूरज
मेघ की जेल
चींटा खे रहा
बारिश के पश्चात
पप्पू की नाव
लगा दी झड़ी
छतरी टूटी पड़ी
आया सावन
छतरी टूटी पड़ी
आया सावन
बारिश आयी
शहर की हो गयी
मुफ्त धुलाई
आयी बौछार
खुली पड़ी खिड़की
भिगोई खाट
आपदा :
आसमान से
रोटी की बरसात
पानी में गांव
गली में चली
सरकार की नाव
पानी में गांव
हेलीकॉप्टर
उम्मीद की किरण
पानी में गांव
मग्गू की रात
छत में छेद
बहा ले गयी
पूरन की खटिया
कहीं न चीं चीं
ना ही कौवे की कांव
पानी में गांव
छत पे चढ़ीं
कई चीजें घर की
पानी में गांव
गली में चली
बहा ले गयी
पूरन की खटिया
गुस्सैल नदी
चिंता में बीती
मग्गू की बरसात
मड़ई चुई
मड़ई चुई
****
रही अकेली
सावन में घर में
भीगी नगरी
देख बदरी
चले घर से ले के
संग छतरी
घेरी बदरी
सखि हो रहा मन
सुनूं कजरी
सखि हो रहा मन
सुनूं कजरी
सुन री सखी!
हम झूलेंगे झूला
गाते कजरी
गाते कजरी
लहराऊंगी
ऊँची पेंग लेकर
धानी चुनरी
भक्ति
भक्तों को रंगा
सावन ने आकर
शिव के रंग
दुनिया बोले
सावन का महीना
जय बम भोले
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****
कहीं न चीं चीं
ना ही कौवे की कांव
पानी में गांव
कई चीजें घर की
पानी में गांव
गली में चली
सरकार की नाव
पानी में गांव
हेलीकॉप्टर
उम्मीद की किरण
पानी में गांव
गली में ताल
बालकों की बहार
पानी में गांव
गांव के वासी
सूखे घट तरसे
पानी में गांव
*****
बरसा घन
भू पे धाक जमाया
सावन आया
मिटी उदासी
मही अब न प्यासी
सावन आया
गाते कजरी
मिल बात बदरी
सावन आया
नदी बौराई
चल दी अकुलाई
सावन आया
इस बार सहेली
सावन आया
कहाँ उमंग
साजन नहीं आया
सावन आया
कहाँ उमंग
साजन नहीं आया
सावन आया
****
बरसा घन
सावन की फुहार
हरषा मन
भिगोया मन
बरस के बादल
हम कायल
वर्षा बहार
मन गावे मल्हार
देख फुहार
मन गावे मल्हार
देख फुहार
बरसा मेघ
दिल मेरा दीवाना
हरषा देख
दिल ने चाहा
बारिश में भीगना
ताना न छाता
*****
पिछले दिन
कर के रखा मेघ
रवि को कैद
झांकता रहा
खिड़की से सूरज
मेघ की जेल
मेघ जो छंटा
चांदनी ने बिखेरी
नभ में छटा
कर के रखा मेघ
रवि को कैद
झांकता रहा
खिड़की से सूरज
मेघ की जेल
घेरी जो घटा
घमंडी सूरज का
गरूर घटा
घमंडी सूरज का
गरूर घटा
चांदनी ने बिखेरी
नभ में छटा
ऊँची ली पेंग
छू पायी न अब भी
दूर थे मेघ
बाढ़ ले आई
द्वार पे बंधी गाय
जाने किसकी!
सुन सखी री!
रोप डालेंगे धान
गा के कजरी
रोप डालेंगे धान
गा के कजरी
तरसा मन
बरसा नहीं घन
सावन आया
बरसा नहीं घन
सावन आया
सूरज घटा
लुका छुपी की छटा
सावन आया
लुका छुपी की छटा
सावन आया