बरसा घन
सावन की फुहार
हरषा मन
आसमान से
रोटी की बरसात
पानी में गांव
छत पे चढ़े
अधिकतर सामान
पानी में गांव
गांव के वासी
सूखे घट तरसे
पानी में गांव
बाढ़ ले आई
द्वार पे बंधी गाय
जाने किसकी!
बहा ले गयी
पूरन की खटियागुस्सैल नदी
घेरी जो घटा
उदंड सूरज का
गरूर घटा
पिछले दिन
कर के रखा मेघ
रवि को कैद
झांकता रहा
खिड़कियों से सूर्य
मेघ की जेल
मेघ जो छंटा
चांदनी ने बिखेरी
नभ में छटा
कर के रखा मेघ
रवि को कैद
झांकता रहा
खिड़कियों से सूर्य
मेघ की जेल
चांदनी ने बिखेरी
नभ में छटा
बरसा मेघ
दिल मेरा दीवाना
हरषा देख
देख बदरी
चले घर से ले के
साथ छतरी
दिल ने चाहा
बारिश में भीगना
ताना न छाता
भिगोया मन
बरस के बादल
हम कायल
ऊँची ली पेंग
अब भी न छू पायी
दूर थे मेघ
चिंता में बीती
मग्गू की बरसात
मड़ई चुई
घेरी बदरी
सखि हो रहा मन
सुनूं कजरी
वर्षा बहार
मन गावे मल्हार
देख फुहार
सुन सखी री!
रोप डालेंगे धान
गा के कजरी
मग्गू की बरसात
मड़ई चुई
घेरी बदरी
सखि हो रहा मन
सुनूं कजरी
वर्षा बहार
मन गावे मल्हार
देख फुहार
सुन सखी री!
रोप डालेंगे धान
गा के कजरी
सूरज घटा
लुका छिपी की छटा
आया सावन
गाते कजरी
मिल बात बदरी
आया सावन
नदी बौराई
बहती अकुलाई
आया सावन
मिटी उदासी
मही अब न प्यासी
आया सावन
लुका छिपी की छटा
आया सावन
गाते कजरी
मिल बात बदरी
आया सावन
नदी बौराई
बहती अकुलाई
आया सावन
मिटी उदासी
मही अब न प्यासी
आया सावन
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