Thursday, 30 July 2026

Sawan haiku

परिदृश्य :

बरसा घन
सावन की फुहार
हरषा मन

लाया फुहार 
रिमझिम सावन 
जगाया प्यार 

इंद्र ने मारी 
भर के पिचकारी 
वसुधा भीगी 

धरती धरे 
सावन में नहा के 
वसन हरे 

गयी देखने 
इंद्र की पिचकारी 
भिगोई साड़ी 

कहाँ उमंग 
सावन का महीना 
पी नहीं संग   

सावन भादों 
इतना न सताओ 
रातों में यादों 

नदी बौराई
चल दी अकुलाई 
पी से मिलने   

घेरी जो घटा 
घमंडी सूरज का
गरूर घटा

सोते ही रहे 
दिन में भी सूरज 
ओढ़े बादल

कल के दिन
कर रखा था मेघ
सूर्य को कैद

झाँकता रहा 
खिड़की से सूरज 
मेघ की जेल 


चींटा खे रहा
बारिश के पश्चात  
पप्पू की नाव 


बूंदों कि झड़ी 
पापीहा बस एक 
बून्द कि प्यासी 


आपदा :

आसमान से
रोटी की बरसात
पानी में गांव
  
पानी में गांव
गलियों में खे रही 
सेना की नाव 

देखते रहे 
पुल के पुल बहे 
जल का बल 

हो रहा अब 
क्षति का अनुमान 
गया तूफ़ान 

हेलीकॉप्टर 
उम्मीद की किरण 
पानी में गांव

हेलीकाप्टर 
मुख्यमंत्री निकले 
बाढ़ देखने 

नल तो सूखे 
घर में आया पानी 
गली से हो के  

बर्फ पिघली 
नदी डायन बन 
कस्बे निगली 

बहा ले गयी
पूरन की खटिया
गुस्से में नदी

चिंता में बीती 
मग्गू की बरसात
छान्ह/ छत टपकी 

बोरी का गेहूं
घर में धरे जमा  
छत टपका 

दुखी किसान 
बाढ़ में डूब गया 
रोपा जो धान 
  
द्वार पे बंधी 
गाय जाने किसकी 
बाढ़ ले आयी 


बारिश आयी 
शहर की हो गयी 
मुफ्त धुलाई 

बाढ़ क्या आयी 
सरकार बहाई 
पानी सा पैसा 

किये कमाई  
नेता व अधिकारी  
बाढ़ की आड़ 

पुलिया टूटी 
बच्चों की आयी मौज
स्कूल की छुटटी

मग्गू की रात 
खिसकाते खटिया
पुरानी छान्ह 

आयी बौछार 
खुली पड़ी खिड़की 
भिगोई खाट 


बूदों की झड़ी
छतरी टूटी पड़ी
स्कूल की छुट्टी
 

  ****
 
 

सूखी अकेली 
सावन में घर में 
भीगी नगरी 

देख बदरी 
चले घर से ले के 
संग छतरी 

घेरी बदरी
सखि हो रहा मन
सुनूं कजरी

सुन री सखी!
हम झूलेंगे झूला 
गाते कजरी

लहराऊंगी 
ऊँची पेंग लेकर 
धानी चुनरी 


भक्ति 

भक्तों को रंगा 
सावन ने आकर 
शिव के रंग 

दुनिया बोले 
सावन का महीना 
जय बम भोले 


******
  ****

कहीं न चीं चीं 
ना ही कौवे की कांव 
पानी में गांव 

छत पे चढ़ीं 
कई चीजें घर की 
पानी में गांव


गली में ताल 
बालकों की बहार  
पानी  में गांव 

गांव के वासी
सूखे घट तरसे
पानी में गांव

   ***** 

बरसा घन
भू पे धाक जमाया
सावन आया

मिटी उदासी
मही अब न प्यासी
सावन आया 


मन उदास 


गाते कजरी

मिल बात बदरी
सावन आया 

नदी बौराई
चल दी अकुलाई 
सावन आया  

रही अकेली 
इस बार सहेली 
सावन आया 

कहाँ उमंग 
साजन नहीं आया  
सावन आया  





   ****

बरसा घन
सावन की फुहार
हरषा मन

भिगोया मन 
बरस के बादल 
हम कायल 

वर्षा बहार
मन गावे मल्हार
देख फुहार

बरसा मेघ 
दिल मेरा दीवाना 
हरषा देख 

दिल ने चाहा  
बारिश में भीगना  
ताना न छाता



  *****



पिछले दिन
कर के रखा मेघ
रवि को कैद

झांकता रहा
खिड़की से सूरज 
मेघ की जेल

घेरी जो घटा 
घमंडी सूरज का
गरूर घटा

मेघ जो छंटा 
चांदनी ने बिखेरी 
नभ में छटा 


ऊँची ली पेंग 
छू पायी न अब  भी 
दूर थे मेघ  

बाढ़ ले आई

द्वार पे बंधी गाय
जाने किसकी!




सुन सखी री!
रोप डालेंगे धान
गा के कजरी

तरसा मन
बरसा नहीं घन
सावन आया 

सूरज घटा
लुका छुपी की छटा
सावन आया

गांव में जीये 
थे अभाव में पर 
भाव में जिये 

हाथ में सोटी 
तन पर लँगोटी 
बिठा ली गोटी 

दर्द उभरा 
मुआ सोने न दिया 
रात में दर्द 

पानी के लिए 
मृग रेत में दौड़ा 
मिला न पानी 

जूता खरीदा 
लंगड़ी हुई चाल 
तंग था जूता 

खाट में घुसा 
खटमल का झुण्ड 
धूप में खाट 

द्वार तो खोला 
अजनवी को देख 
बंद की द्वार 

घड़ी को देख 
दफ़्तर को निकले 
पीछे थी घड़ी 

प्रेम के मारे 
मीरा भई दीवानी 
कान्हा से प्रेम 

जीत की खुशी 
दिमाग फिर गया 
पची न जीत 

दादा की छड़ी 
कभी सहारा लें के 
चलते दादा 

हॉकी का मैच 
खेलने को सुरेश 
ख़रीदा हॉकी 

पीठ पे लदा 
बस्ते का बोझ भारी 
कोमल पीठ 

चश्मा लगाया 





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