तेरी आँखों में किसी ने झील, किसी ने समुन्दर देखा;
मैंने तो बस बहते हुए पानी देखा, हे नारी!
कभी आत्मज का मोह लिए, कभी प्रियतम विछोह लिए ;
सिसकियों में ही तेरी जिंदगानी देखा , हे नारी!
दुःख के घूंट स्वयं पी जाती, खुशियों की बाँट लगाती;
अपनों के लिए सर्वस्व लुटाते देखा, हे नारी!
फूलों से भी सुन्दर तू है, प्रभु की विशिष्ट अनुपम रचना;
घर की बगिया में सुगंध बिखराते देखा, हे नारी!
कभी तो ममता का, कभी बोझ कुटुंब का भारी तुझपे;
थके बिन सेवा करते, ज्यूँ चारी देखा, हे नारी !
लिए हुए शक्ति सृजन की, तू ही देती जन्म पुरुष को;
तेरी भावनाओं पर करते सवारी देखा, हे नारी!
डाली से टूट मंदिर जाएगी या जाएगी रंगशाला किसी;
भाग्य के लेखा से तुझे अनभिज्ञ देखा, हे नारी!
आता जब भी संकट भारी, हो जाती खड्ग सी कठोर तू ;
पर प्रेम वश पराजय का सानिध्य देखा, हे नारी!
चलना होता तुझे, दुःख के काँटों से आंचल को बचा,
जग की राहें काटों से भरे देखा , हे नारी!
पति चाहे पतित, व्यसनी हो, सहती उसको भी चुपके;
पति के लिए सुखों से परे देखा, हे नारी!
अभागे जो देख पाते बस, यौवन की जो सुंदरता तेरी;
उम्र ढले माँ सी सुन्दर होते देखा, हे नारी!
कितने निष्ठुर होते, दुखाते जो, तेरे कोमल मन को;
तुझको सदैव कुटुंब संजोते देखा, हे नारी!
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