Wednesday, 25 July 2018

Kavita ki chingari


कविता की चिंगारी

कविता की चिंगारी को, मशाल बनाकर मानूंगा।
शब्दों को गूँथ माला, कमाल बनाकर मानूंगा।

दिखलायेगी राह प्रीति की, ऐसी जयोति जलाऊंगा।
तम, उर के निकाल, दिलों में प्रकाश मैं भर जाऊंगा।
चल पड़े जो शांति, अहिंसा और विकास के पथ पर,
युवा शक्ति को प्रेम का, भूचाल बनाकर मानूंगा।

सूरज के उगते ही और कमलदल खिलते ही।
दिन भर के आये नए विचार, शाम के ढलते ही।
लेकर कलम शब्दों में ढाल, साहित्य के सागर में,
सुन्दर सी एक नाव विशाल, बनाकर मानूंगा।

राजनीति के दलदल, और कुशासन  के घर में।
वही बोलूंगा, जो कुछ देखूंगा,  झांक कर निडर मैं।
गाड़े हुए सब लोक विरुद्ध, उन कार्य कलापों को,
खोद डाले जड़ से जो, कुदाल बनाकर मानूंगा।

शब्दों को जोड़ तोड़ कर, और कुछ मीठे रस भर।
वेदना और संवेदना की गहराई तक जाकर।
जीवन के सभी पहलुओं और दिलों को छूकर,
कविता को जीवन का सुर ताल बनाकर मानूंगा।

भूत को टटोलते, भविष्य के गर्भ में झांककर।
सोच की गहराई में डूब, भाव को निकालकर।
अंतरिक्ष के पार तक, झांकने की खिड़की खोल,
दिव्यदृष्टि दूरबीन विकराल बनाकर मानूंगा।

शत्रु, सीमा पार से यदि, आँख कभी दिखलाता है।
बिना बात हमारे प्रहरी को, युद्ध हेतु उकसाता है।
शौर्य भर दूँ वीरों में, विजय पताका फहराएंगे,
कविता को अपनी, अरि का काल बनाकर मानूंगा।

शब्दों के तीर से यदि, दिल कोई आहत होगा। 
छंदों के प्रभाव से हृदय के घाव में राहत होगा। 
समाज में नफ़रत की कोई आग अगर फैलाये, 
छंद, घृणा से बचने का ढाल बनाकर मानूंगा। 

कल्पनाओं से दिखाऊं, जन जन को सृष्टि सारी। 
अलख जगा दूँ प्रेम का, हो जाये दुनिया प्यारी।
जीवन में मिठास हो सबके, मोहक संगीतों का,
गीतों को अपने, मृदंग झाल, बनाकर मानूंगा।

Kanoon bauna kyon hai


कानून बौना क्यों है?

कानून हुआ इतना बौना, क्यों है?
किसी के हाथ का खिलौना, क्यों है?

कोई दसियों वर्ष, कैद काट निर्दोष।
कोई पकड़ से दूर, सिद्ध हो के भी दोष।
किसी के लिए तो काँटों की राह,
किसी का नरम बिछौना, क्यों है?

कहीं बन जाता है जाति का आधार। 
किसी का क़ानून से चलता व्यापार।
फांस लेता कोई, झूठ बोल दूजे को,   
आखिर करता काम घिनौना, क्यों है?

चलता है कोई, लिए जेब में कानून।
सुखा लेता कोई, न्याय पाने में खून।
कौन से दलदल में है, ये जकड़ा पड़ा, 
न्याय चाहने वालों का डरौना, क्यों है?

Saturday, 21 July 2018

Paap ke baadal

घिर घिर आये, पाप के बादल।
भीग मतवाला, मन ये पागल।

बचपन में आ बैठा सिर पर।
बढ़ता गया, बड़ा होने पर।
खुद से बड़ा, रहा इसका हाथ।
चलता रहा जीवन के साथ।
जवानी में हुए और भी कायल।
घिर घिर आये, पाप के बादल।

छोटे से बड़ा ज्यूँ होते गये।
पापों का बोझ ढोते गये।
दशा देख के समझ में आयी। 
ढूंढते पाप में सभी मलाई।
उसको भी किसी बच्चे सा छल।
घिर घिर आये, पाप के बादल।

आगे बढ़े बुढ़ापे की ओर।
छूटता गया पापों का छोर।
समा गए जमीन के अंदर।
पापों को छोड़, हवा में ऊपर।
भीग सके अन्य कोई आँचल।
घिर घिर आये, पाप के बादल।

संग मेरे ये अंधेर हुई।
समझने में बड़ी देर हुई। 
ऊंचाई पर बसता है पाप।
जीवन दबकर, करता प्रलाप। 
मिथ्या, लोभ का बन घन श्यामल।
घिर घिर आये, पाप के बादल।

Thursday, 19 July 2018

Tirange me lipat


तिरंगे में लिपट कर आया है।  
दूध न पानी, खून से नहाया है।  

संजोये हुए था जिंदगी के सपने,
छीन लिया समय से पहले ही रब ने।   
जवानी में देश की सेवा की ठानी,  
बुढ़ापे में संवारेगा गांव को अपने।  
यौवन राष्ट्र की भेंट चढ़ाया है।  
तिरंगे में लिपट कर आया है।  
  
किसी का भाई और किसी का लाल था।  
अरि के लिए खड़ा सीमा पर काल था।  
कर रखा राष्ट्र को वो साँसे समर्पित,     
सुरक्षा के हेतु धरा रूप विकराल था।  
भय से उसके रिपु बहुत थर्राया है। 
तिरंगे में लिपट कर आया है। 

गत वर्ष पति बना, पिता बनने वाला था। 
देश भक्ति में खुद को पूरा ढाला था। 
इन खुशियों से दूर बहुत, महावीर वो,  
सीमा पर डंटा देश का रखवाला था। 
वतन के लिए प्राण गंवाया है। 
तिरंगे में लिपट कर आया है। 

आज देश, गांव, आसमान रो रहा है। 
खेतों की फसल व खलिहान रो रहा है। 
राष्ट्र के कर्म वीर का शव जलाकर,
भभक भभक कर श्मशान रो रहा है।  
आया है, वो शहीद की काया है। 
तिरंगे में लिपट कर आया है। 

Wednesday, 18 July 2018

Kavita se pyar


मुझको कविता से प्यार हुआ।

भाव भरे मन ये व्याकुल, कविता जनने को हर बार हुआ। 
मैं रीझ गया हूँ भावों पर, मुझको कविता से प्यार हुआ।
शब्दों के फूल किया अर्पण, सपना मेरा साकार हुआ,
कविता की खातिर फिर तो ये, जीवन अपना न्यौछार हुआ। 
मुझको कविता से प्यार हुआ। 

देते शब्दों के फूल पिरो कर, कविता का बेजार हुआ। 
उसकी महक शराब बन गयी, और नशा दिल के पार हुआ।  
शब्दों के वो फूल पिरोये, पहन रखा हूँ माला सी मैं, 
वो है चमन गुलों की मेरी, मैं फूलों का बाजार हुआ।  
मुझको कविता से प्यार हुआ। 

रहना उस बिन एक पल भी मुश्किल, अगर नहीं दीदार हुआ।
सोच डुबाये रहती गहरे, सिर पर चिंता का भार हुआ।
दिल मेरा उसमें है बसता, वो बसती है दिल में मेरे, 
साथ निभाता हरदम मेरा जो, पक्का वो तो यार हुआ।
मुझको कविता से प्यार हुआ।



2222 2222 2222 2222




अब सब कुछ हुआ हमारी मर्जी के बिना जा रहा। 
पिछली करतूत हमारी, अपराध सा गिना जा रहा। 
अधिकारी भी अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे हैं,
संविधान बचाओ, परिवार से यह छिना जा रहा। 

Monday, 16 July 2018

Hanuman bhajan



अंजना की गली
खेल रहे बजरंग बली।
पवन आये ले के प्रसाद
शिव का पाई आशीर्वाद,
खिली उसके मन की कली
अंजना की गली

पा गयी मन जो विचारी
भई अति हर्षित महतारी
झूम उठी खुशियों से भरी
अंजना की गली

अंजना हो गयी पुत्रवान
पवन सा था वो वेगवान
सखियाँ ईर्ष्या से जलीं
अंजना की गली

देखा कहीं  ऐसा बालक
सोने का तन धारे बानर
धन्य हो गयी, बड़ी भली
अंजना की गली






2

मेरे हनुमान लला
इन्द्र  ने चला दिया बज्र
मूर्छित  हो गए  हनुमान, मेरे हनुमान लला
पवन ने रोका हवा का बहना
संकट में सबके प्राण, मेरे हनुमान लला
विष्णु आये शिव जी आये
कर दिये स्वस्थ बलवान, मेरे हनुमान लला
अग्नि वरुण सब देवता आये
देवों ने दिया वरदान, मेरे हनुमान लला
दे देकर देवों ने वर
कर दिया सर्व शक्तिमान, मेरे हनुमान लला 





3
पाठशाला चले
पढने के लिए हनुमान
पाठशाला चले
गुरु की खोज में भटके दर दर
गुरु मिल गये उनको दिनकर   
मन में लिए श्री राम
जपते राम की माला चले
सूरज से सीखा वेदों का ज्ञान
चक्कर काटते प्रातः से शाम
सूरज के संग संग
धरे रूप  विकराला चले
भये हनुमान ज्ञान गुण सागर
तीनों लोक हैं तुमसे उजागर
बुद्धिहीन विद्वान बनें   
भक्तों के कृपाला चले






भक्तों का रखते ध्यान
बड़े नटखट हैं हनुमान

जंगल में वे चक्कर काटें
फल खाने को कूदें फांदें
अंजना ढूँढे अपनी गली में  
घूमे वो साँझ विहान 
बड़े नटखट हैं हनुमान 

घूमते रहते वन में अक्सर
पेड़ पेड़ डाली डाली पर
लेकर चढ़ जाते पेड़ों पर
उठा ऋषियों  के सामान

धर लेते दौड़ते शेरों को
हिला देते जड़ से पेड़ों को
उठा लेते हाथों हाथी को
बड़े वे ऐसे बलवान






बड़े नटखट हैं हनुमान
उछल कूद करते जब हनुमत, डाली जाती टूट
पांव रखते शिलाओं पर जब, शिलाएं जाती फूट
उठा लेते एक ही हाथ, हाथी भी बलवान
बड़े नटखट ..

ऋषियों के यज्ञ में इन सबसे, होती बाधा उत्पन्न
उनकी इन नटखट बातों से ऋषि मुनि होते खिन्न
निहारते यज्ञ ऋषि मुनियों के, लगा कर के वो ध्यान
बड़े नटखट   ... 

उलाहना लेकर गए ऋषि मुनि, माँ अंजना के घर
बोलीं आप ज्ञानी ऋषि मुनि, क्षमा इसे दें कर
हो गया होगा खेल खेल में, नहीं किया कुछ जान
बड़े नटखट  ....