Tuesday, 26 January 2016

Haiku Feb16 upar wala



हो गये सेठ
दिखाते लड़ रहे 
गरीबों हेतु  

बोलती ऑंखें 
कुछ कहतीं ऑंखें 
सुन सको तो 

होली के रंग 
लगे पिया के हाथ  
तो बने बात  

चलाया कैंची 
गांठ कट जाएगी 
दो टूक रस्सी 

पानी हो जाता 
गर्म लोहे पे भस्म 
सीप में मोती   

प्रातः की बेला
चहकती चिड़ियाँ
लगाईं मेला


मांगो न भीख 
राह बनाओ खुद 
नदी की सीख 


ढूंढें हीरे में
सुंदरता की खान
आचरण में

मैं रहूँ मौन
फिर भी सुन लेता
ऊपर वाला

भाग्य का ताला
चाहे तो खुल जाय
ऊपर वाला

प्रातः की रश्मि
देता तभी मिलती
ऊपर वाला

हवा व पानी
देता अन्न का दाना
ऊपर वाला

रहती साँस
जब तक चाहता
ऊपर वाला


सृष्टि की गाड़ी
चला सकता वही
ऊपर वाला

***********

देकर ज्ञान
करें हमें विद्वान
माँ सरस्वती

अज्ञान तम
हर ले एकदम
माँ सरस्वती

वीणावादिनी
तू पथ प्रकाशिनि
दे ज्ञान रश्मि


मानव देह
आग  को समर्पित
बिना साँस के


होता निर्विघ्न
होती है जिस पर
गणेश कृपा

जोड़ती भाषा
अभिव्यक्ति के संग
देश के जन


बगिया खिली
भौरों को मस्ती मिली
आया बसंत

हुआ समाप्त
कोहरे का पहरा
आया बसंत


********************

सरसों फूली
गये आम बौराय
फागुन मास

मन रंगीन
खिले फूल रंगीले
फागुन मास

बहका मन
चहका चितवन
फागुन मास

पिया के बिन
नीक न लागे रंग
फागुन मास

मन बौराय
पिया पिया बुलाय
फागुन मास

ओ रे पवन
'आयो' ले जा सन्देश
फागुन मास


ऋतु बसंत
प्रिय प्रियतम के
रह के संग

माली के मन
खिल रहा बसंत
फागुन मास

****************

ऋतू का राजा
धरती पर छाजा
मुस्करा उठी

उठी उमंग
प्रेमियों के दिल में
छाया बसंत


फूलों का मिला
भौरों को निमंत्रण
आया बसंत

दुल्हन धरा
इतराती ओढ़ के
बसंती चुन्नी

पृथ्वी के सिर
सतरंगी चुनरी
बसंत ऋतू

करे प्रगाढ़
भाई दीदी का प्यार
राखी की गांठ

****************

होता सबका
बचपन का तीर्थ
नानी का घर

माँ ने ममता
कहाँ से लाई जाना
नानी के घर

बच्चों को भाता
बिताना अवकाश
नानी के घर

पुण्य का काम
होता है बहुत
लगाना पेड़

प्यास बुझाता
जलधर का भी
जल दे पेड़

अपने हाथ
अपने को न सूझें
धुंध ने घेरा

*****************

देता पहरा
जगा रहा सिपाही
सुबह तक

नव दम्पति
चूड़ियाँ की खनक
सुबह तक

खेत सींचते
रहा वह भीगते
सुबह तक

छुप के चले
सजनी से मिलने
रात्रि पहर

बितायी रात
देखते हुए चाँद
सुबह तक


***********
चलते हैं जो -
होती दुनिया पीछे
प्रेम की राह

चलो ले संग
जिनकी दशा तंग
प्रेम की राह

त्याग का भाव
है लिए चला जाता
प्रेम की राह

खुशियों भरी
होती है हरदम
प्रेम की राह

निर्मल मन
हो जाता जो चलते
प्रेम की राह

*************


धन अभाव
रखे जो बड़ी चाह
कष्ट में मन

मोक्ष तो चाहे
मरने से डरता
पागल मन

चली उछल
पर्वतों से निकल
बहती नदी

************
कहता गांव
सुख दुःख की बातें
पेड़ की छाँव

पेड़ से बेल
लिपट होती खड़ी
पेड़ की छाँव

पौधे जो छोटे
पेड़ नहीं हो पाते
पेड़ की छाँव

आये अतिथि
बैठाये ले जाकर
पेड़ की छाँव

बंधे खूंटे से
गाय भैंस बकरी
पेड़ की छाँव

कुत्ता भी बैठा
आ खटिया के नीचे
पेड़ की छाँव

रहते संग
पशु पक्षी संतुष्टि
ग्राम्य जीवन

********


तास के पत्ते
ले बैठे खलिहार
नीम की छाँव

पुंछ डुलाती
भैंस मक्खी उड़ाती
नीम की छाँव

गर्मी में कुत्ता
ढूंढ लेता राहत
नीम की छाँव

आये अतिथि
बिछ जाती खटिया
नीम की छाँव

कहते बैठ
अपने सुख दुःख
नीम की छाँव

*******************

दोनों में प्यार
उमड़ जाता देख
एक दूजे को

बहुत प्यार
कभी करते थे वे
एक दूजे को

नहीं भूलते
जन्म दिन पे भेंट
एक दूजे को

समझे नहीं
गलत फहमी में
एक दूजे को

व्यंग के बाण
आहत कर देते
एक दूजे को

देख के अब
मोड़ लेते हैं मुंह
एक दूजे को

**************
छुट्टी समाप्त
विद्यालय रौनक
फिर से लौटी

रात की रानी
चांदनी में नहा के
हुई सुहानी 

बिटिया आई
चलती रहीं बातें
सुबह तक

कोई भी दर्द
जाता वहीं ठहर
रात्रि पहर

हँसते फूल
गाते खग मृदुल
गांव की भोर

उड़ानें रद्द
खोया हवाई अड्डा
धुंध ने घेरा 


खोल किताब 
पढ़ रहे जनाब 
आँखों में झपकी 

दिखाते बाल
तेल के प्रचार में 
जैसे कि डाल

ले ली कितनी 
सासें नापती घडी  
हाथ में बंधी 

नापती घडी
बची सांसें कितनी 
हाथ में बंधी

बीमार पड़ी
सड़क ने की छुट्टी
गली की ड्यूटी

होता है अच्छा
कितना भी घुमा लो
सीधा ही रास्ता

सोया पड़ा था
पाया फिजां का खत
आया बसंत

सूर्य झांकता
पर्वतों के पीछे से
हुआ विहान

जगा सूरज
नींद पूरी कर के
आँखों में चौंध      

पार्क का बेंच
उस पर कहानी
हम दोनों की

दिखाने लगा -
ठण्ड के छुट्टी जाते
सूरज ऑंखें

शब्दों के बीज
बोया कागज पर
उगी कविता

जब से हुआ
हम दोनों का सिला
शकुन मिला

तुम जो गये
सपने हुए चूर
हमसे दूर 


होती जिसपे
होते काम निर्विघ्न
शिव की कृपा

कहे कुंआरी
जय शिव शंकर
सुन्दर वर

प्रेम से बोले
जो जय बम भोले
पूर्ण कामना


खोलते शिव
जब तीसरी आँख
सर्वत्र नाश

जटा में गंगा
बदन पे भभूति
भोले भंडारी

हो गया स्वाहा
स्वयं ही भष्मासुर
शिव की माया


शिव विवाह
उम्मीद में बाराती
छनेगी भांग

भरें भंडार
शिव भक्त जनों का
भोले भंडारी

हो कोई साथ
कट जाती है राह
चलने वाला

गुड क गुण
जीभ पर मिठास
बढ़ाता खून


चलती कश्ती
बह अपनी मस्ती
लगाती पार

लगाती पार
मोड़ के पतवार
कश्ती की दिशा

चाहता खेना
बन के मन माझी
जीवन कश्ती



मन ले ख़ुशी
सज धज के चली
पिया की गली

देख के जीता
स्विस व वोट बैंक
वरिष्ठ नेता

गिरे नभ से
गाड़े जाते हैं लोग
भूमि के नीचे

विधानसभा
बनाते विधायक
शब्दों का किला

***********
जमीर तक
जला के रख देती
पेट की आग

नाच नचाती
तरह तरह से
पेट की आग 

खेल दिखाती
गजब गजब के
पेट की आग

सब जला के
कर देती है राख
पेट की आग



*****************


पीकर पानी
चली आग लगाने
लेखनी मेरी

पीती है पानी
उगलती है आग
लेखनी मेरी

रातों की नींद
कभी लेती है छीन
लेखनी मेरी


समेट देती
पन्नों में ही ब्रह्माण्ड
लेखनी मेरी

दिल छू आई
उनका भीतर से
लेखनी मेरी

रोती है कभी
बहाती है आंसू भी
लेखनी मेरी

होता है दर्द
चिल्लाने लग जाती
लेखनी मेरी

औरों का दुःख
देख के कराहती
लेखनी मेरी

देश की सोती
जवानी को जगाती
लेखनी मेरी

महका देती
बसंत में बगिया
लेखनी मेरी



************


बिठाने नाव
केवट श्रीराम का
पखारा पांव


जागता रहा
उसके साथ साथ
नभ में चाँद

बंद नहीं की
ठण्ड में भी खिड़की
नभ में चाँद

रातों को फूल
अपनी रंगत में
नभ में चाँद

रातों को देख
मुस्कराती चमेली
नभ में चाँद

ढूंढता सूर्य
दिन में छुप जाता
नभ में चाँद

जब भी आता
तारों को लिए साथ
नभ में चाँद

उसे तो कभी
ऊपर को देखता
नभ में चाँद

एक वही था
रात निभाया साथ
नभ में चाँद

************

मिटा देते हैं
खींची हुयी लकीरें
पानी व मन

नहीं लड़तीं
मंदिर मस्जिद की
ईंटें कभी भी

कहीं जड़ दो
मंदिर या मस्जिद
ईंटों की भक्ति

खुदा से खुद
खोदा जिसने पाया
खुद में खुदा  

बेलन धारी
खुश तो रोटी ना तो
सिर पे मारी

मैके बेचारी
ससुराल आकर
चण्डिका नारी

ब्यूटी पार्लर
ज्यादा वक्त गुजारी
शहरी नारी

रोटी के कोने
बिटिया के लापता
बड़ी हो गयी

बना कन्हैया
आज का दुर्योधन
खींच के चीर

आज भी बैठे
राष्ट्र में धृतराष्ट्र
सत्ता का लोभ

ले के चलती
घर कि जिम्मेदारी
घर की चाभी

बेलन धारी
खुश तो रोटी ना तो
सिर पे मारी


प्रातः पत्तियां
सर्दियों में अकड़ी
आंसू में भीगी

सोख लेता है
जीवन के रस को
बालू सा धन

मुझे ही नहीं
मा को भी संभाली
बुढ़िया दादी

सर्द की रात
सूखने नहीं पाती
कवि की स्याही

बनाया घर
तेरे लिए शीशे का
पत्थर पड़े

लोगों ने कहा
आया गली में तेरी
दीवाना मुझे

कैसे मैं कहूँ
तेरी तंग गली में
अकेला मैं हूँ

जुड़ने लगे
जब तुझसे तार
बिजली गिरी

प्रेम का धागा
बांध दिया उसने
तोड़ न सका

डोलूं बाजार
तू ना खरीददार
जान कर भी



डंक का डर
शहद की मिठास
एक चुनाव

सुगंध देते
नहीं देते वो फूल
खाने को फल

उपजाता है
सभ्यता का आभाव
कड़वे बोल

बागी सोच :: कड़वे भाषण

छिछली नदी
लहरों को उठाती
शोर मचाती


जब भी देखा
भागते ही अँधेरा
दीये का डर

उड़ता कौवा
लगा दिया सामने
चन्द्र ग्रहण

बदला रंग
चेहरे के ऊपर
मन के भाव

कर ही दिया
हौसला जो उछला
मेघ में छेद

छू कर आई
हिम्मत जो जुटाई
लक्ष्य की चोटी /अपना लक्ष्य

चाहे कितनी
सुखा न पाती गर्मी
कवि की स्याही

ये है वो पंख
दिखाया आसमान
बिठाये मुझे

लेकर गये
बादलों से ऊपर
मुझे ये पंख

मछलियाँ भी
दिखातीं करतब
पेट के लिये


कैसा करिश्मा
चमक रहे साथ
जुड़े दो चाँद
 
चढ़ता पारा
ठन्डे शरबत की
बढती मांग

नीचे गिरते
निगम परेशान
जल स्तर से

दुखी धरती
चुरा लेता सूरज
गर्मी में जल  


घर से दूर
एकांत में निकला
तुझे पाने को
वहां भी शोर मचा
मुझको भगाने को

मैं कैसा मूर्ख
डोलता बाजार में
कहीं वो दिखे
जब कि मालूम है
वो तो व्यापारी नहीं 


हीरो बना है
देश द्रोही कन्हैया
भूले शहीद 


सबकी गर्मी
किसान की नजर
फसल पर

गर्मी में दिल
चाहता हरदम
शीतल पेय

व्याकुल वृक्ष
बोल रहे सूर्य से
क्यों जला रहा

उगले रवि
अम्बर से क्रोधाग्नि
तपती जमीं

घिरेगा रवि !
कर ना ज्यादा गर्व
मेघों में तू भी

ना कर पार
आते ही होंगे मेघ
हद को रवि !


जल जाता है
सामने  जो आता है
थार की सांस

भेजता थार
मिला सूर्य से हाथ
गरम हवा

गर्मी में टारे
यहाँ का बालू वहां
मरू में हवा

भुनते जीव
थार का रेगिस्तान
भाड़ का बालू

पीठ पे पानी
लिए ढूंढता खाना
थार में ऊंट

मरु फलक
सितारे सी चमक 
अकेला पेड़

मरू से लड़ा
हिम्मत से अकेले
जिन्दा हूँ खड़ा

अकेले जिया
किसी मुसाफिर को
छाया न दिया

मरुस्थल में
अंगूठी का नगीना
हरा सा पेड़

गर्मी में टारे
यहाँ का बालू वहां
मरू में हवा

पीठ पे पानी
लिए ढूंढता खाना
थार में ऊंट

खुद पे डंडा
लगा भर देने से  
हो जाता खुदा

दुखी किसान
मुरझाई फसल
गर्मी की मार

प्यासे डोलते
पशु छटपटाते
गर्मी के मारे

तपती राह
व्याकुल पथिक
गर्मी की मार

दुबके रहें
जी करता घर में
गर्मी के मारे

बनी है भट्टी
धूप में खड़ी कार
गर्मी की मार

प्यासा लातूर
जल हो गया दूर
गर्मी की मार

रख दी खोल
बांच लो ये किताब
एक पन्ने की

रख दी खोल
सरकार की पोल
एक तस्वीर

सिमटी हुईं
हजारों कहानियां
ये एक पन्ना


अपने ही थे
छीन जमीं आसमां
बेगाना किये

अपने ही थे
छीने जमीं अम्बर
किये बेघर



हरेक दिन
कुछ नया सिखाता
गुरु हमारा

मेरी छाँव में
कितने फूले फले
बूढ़े हो चले 

उम्र बिताई
चेहरे की झुर्रियां
यही कमाई


खर्च दी उम्र
बदले मिली बस
माथे की झुर्री

चेहरे की है  
ऊबड़ खाबड़ में
छुपा तजुर्बा

प्यार की छाँव
कहती ये झुर्रियां
और भी घनी  


नारी या नर
संवेदना के बिना
गया वो मर

चाहे कितनी
सुखा न पाती गर्मी
कवि की स्याही  


Friday, 27 November 2015

Haiku Dec 15 / lahar

घंटों की चुप्पी
अयोध्या में गूंजता
बूट का शोर

जग जाता है
सोता हुआ समुद्र
चंचल वायु
.
रोज नहाती
फिर भी है बसाती
नदी में मत्स्य

तोड़ देती हैं
मिलते ही किनारा
लहरें दम

होती लहर
तट पर आकर  
अबला एक

उठा न पाता
छिछला होने पर
जल लहर

उठ पाती हैं
गहराई हो तभी
लहरें सभी



***************

जगा देता है
पवन का चुम्बन
सिंधु स्पंदन

बुझा न पाती
आँखों की बड़ी प्यास
सिंधु तरंग

मन उमंग
उठ जगा देती हैं
सिंधु तरंग

देख सतत
मन नाहीं थकत
सिंधु तरंग

अनोखे रंग
दूर क्षितिज संग
सिंधु तरंग

हवा के संग
करें अठखेलियां
सिंधु तरंग

ले जाती खींच
सागर तट पर
मन को मौज



*************

रुकना नहीं
हमसे ये कहती
बहती नदी

सिंधु का प्यार
उसी में डूब जाती
पाकर नदी

बहती पर
शोर नहीं करती
गहरी नदी

रात या दिन
चलते रहो नित
गाती है नदी

प्यासा सागर 
जाती पानी लेकर
पीने को नदी

जीव अनेक
रहते जो अंदर
पालती नदी

बहती नदी
रुक जाना न कहीं
कहती नदी

नहीं मिलती
इस जग को गति
होती न नदी

एक अनंत
मिल जाती अंत में
जीवन नदी

मांगो न भीख
खुद बनाओ राह
नदी की सीख

बहती नदी
मानव उत्पीड़न
सहती नदी

करके मैला
मत करो विषैला
तुम्हारी नदी

ले के बहती
छोटी नदियां साथ
महती नदी

**************

नहीं बनता
समय नदी पर
पुल या बांध

देता है हमें 
हमारी जिंदगानी
नदी का पानी

बन जाती है
खेती की पतवार
नदी की धार

बन जाता है 
टूटने पर सैलाब
नदी का तट

जीव अनेक
नदी में रहकर
पालते पेट

हल्का हो जाता
हिमगिरि का भार
नदी में फेंक

पा जाती दिशा
हो जाती तेज गति
नदी की नाव


*************

दे देते प्राण
बनाने को कीटाणु
हाथी की राह

अंधे देखते
खम्भा पंखा दीवार
विवेकी हाथी

सुन लेता है
मौन होने पर भी
ऊपर वाला 

बनता माला
जब पिरोता धागा
मोती का दाना 

नहा धोकर
चल पड़े भास्कर
दिन की चर्या

ऊपर जा के 
मेघ ठण्ड के मारे  
रोने लगता 

दिखाने लगी 
मूंगफली भी भाव 
ठण्ड आ गयी

नभ खोलता 
एक आँख दिन में 
एक रात में  

खाने दौड़ता 
सूर्य तम के पीछे
चौबीसों घंटे 

रात में बिल्ली 
आँखों में जला लेती 
डायोड बल्ब  

देख के मेघ 
नाचने लगता है
मोर का दिल 

पहने जूता 
सरपट दौड़ता 
खुर में घोडा 

सीख न पाया 
मौसी से चढ़ पाना 
पेड़ पे शेर 

दे के चिड़िया 
उजड़वाई नीड़
कपि को सीख 

पैकडे बैठा 
डाली को अजगर  
छीने न कोई 

असमंजस  
बर्फ देखें या रास्ते
कश्मीर आ के 

बर्फ की गेंद
खिलखिलाते फेंक  
घाटी का मजा  


धरा आकाश 
हिमपात के वक्त 
एक आभास  

कुल्लू मनाली
पर्यटकों से खाली 
बर्फ में ढकी 

घाटी में भारी 
हो गयी बर्फ़बारी 
पसरी शांति 

जला अलाव
जैसे ही गिरा पारा  
शामू के द्वार

हुआ सवेरा
नींद मग्न सूरज
धुंध ने घेरा

आँखों को मूंद
सोया पड़ा चन्द्रमा
ओढ़ के धुंध


आप उतरो
सामान हमें दे दो 
कुली की अर्ज 

देर से आई 
स्टेशन पर खड़ी 
कल की गाड़ी 

भांग धतूरा  
कर देते बेहोश 
शिव का भोग 

लेकर चले 
शिवरात्रि मनाने
मंदिर बेर

जाड़े की यात्रा 
गाड़ी की गति बुरी  
धुंध में घिरी 


रात की लोरी
प्रातः ही भुला देता 
पक्षी का गान 

प्रातः ही रश्मि 
सुनने चली आती 
खगों के गीत

पक्षी झरने 
वर्षा वायु सुनाते  
प्रकृति राग 

झुक जाता है 
सुनने हेतु बांस 
वायु का गीत 


शोर के बीच 
सोने हेतु पटरा
रेल की यात्रा 

सत्ता में आ के  
अपनों में ही बांटें 
दूसरे ताकें 

घंटों की चुप्पी  
अयोध्या में गूंजता  
बूट का शोर 

चाय ने रोका 
बहुतों को जाने से 
मदिरालय

आज नहीं है
घंटों बैठते नीचे
जिस वृक्ष के

खो गयी राहें
अब किधर जाएँ
घाटी में बर्फ

जहाज रेल
सबको किया देर
धुंध ने घेर

रात में खींचें
कभी ये तो कभी वो
छोटी रजाई 

निगल गयी
धुंध आग का गोला
चिंतित नभ

छाया कोहरा
बुझी नभ की आग
ठण्ड से कांपे

बुझाया धुंध
अम्बर का अलाव
अब क्या तापे

चाहती धुंध
रखना दिन भर
सूर्य को ढांपे

हुआ बेबस
धुंध में घिरा सूर्य
नभ से ताके

भू को चूमने
झुक जाता गगन
दूर क्षितिज

गिद्ध व चील
नभ में मंडराते
युद्ध समाप्त

धरा तत्पर
सूर्य का लगाने को
नया चक्कर

सिमट गया
इतिहास के गर्भ
एक और वर्ष

बच्चे हैं खुश
लाये उनको गिफ्ट
थैंक यू सैंटा

एक मिनट!
हो गया बड़ा दिन
आज का दिन
 
लेकर आये
मंगल हर पल
नूतन वर्ष

नए साल में
बुखार में है पड़ी
सर्दी में दिल्ली

ओढ़ के चली 
झिलमिल चादर 
सर्दी में गाड़ी

हवाई अड्डा 
उड़ानों में बिलम्ब 
धुंध की ब्रेक

धुंध में चलें 
गाड़ियों की रौशनी 
लापता गाड़ी

घर की बहू
आदर पाकर हो
लक्ष्मी का रूप

आने से गुरु
होता है जीवन में
सत्कर्म शुरू

सम विषम
कर रहा दिल्ली में
धुआं को कम

गुजरा साल
नहीँ ले गया साथ
आतंकवाद


************************


फायदा हेतु   
तुगलकी कायदा 
हमारी दिल्ली  

नकाबपोश 
औरों को ही दिखाते 
जन्नत 

बंदूकधारी  
बंधक गिन रहा  
वे बची सांसें 

काले बुर्के में  
मगर कह रहा 
खुद को बन्दा
  
काला नकाब
काली ही करतूत 
छुपा पिशाच 

क्यों न मरते 
जन्नत मिल जाता 
खुद अपने  


यह सवाल 
सहिष्णुता ही है कि 
नहीं उठाया 
बाबरी सूत्र तोड़ 
संविधान बनाया 




Monday, 23 November 2015

Brahman


ब्राह्मण दरिद्र होकर भी समाज को ऊँचा रखता रहा है।
पूजा पाठ करके और दान पाकर यापन करता रहा है।
अनेकों विरोध और त्रासदी को सहकर भी दुनिया में,
नीतिगत शिक्षा प्रदान व चरित्र निर्माण करता रहा है।

समाज को कर्म व पूजा-पाठ की विधि सिखाता रहा है।    
वेद, पुराण, ग्रंथों को कंठस्थ कर के बचाता रहा है।
धर्म, संस्कृति और संस्कारों को जीवित रखा ब्राह्मण,
धर्म का उत्थान कर, ईश्वर में आस्था जगाता रहा है। 




Friday, 6 November 2015

Chalo manayen diwali


चलो चलें, उसके घर, मनाएं  दिवाली
पड़ी बिना तेल के, दीया है खाली।

जलाते होंगे लोग, हजार दीप घर में
एक दीया जलाके, अँधेरे को भगा ली।  

बिन के ले जाता, बचे मोम और तेल
रख लेती दीया जलाने, माँ संभाली।

खुश हो होकर देखे फूलझड़ी पटाखे
औरों ने छोड़े, खुशियां उसने मना ली।

होती होंगी मिठाई, किस्म किस्म की
खा लिया मग्न हो, माँ ने जो बना ली।

लाई थी माँ, दिया किसी का, जीर्ण वस्त्र
नया बताकर, दिवाली पर पहना दी।

चलो चलें, उसके घर, मनाएं दिवाली


एस० डी० तिवारी 


पुत्र सीमा पर


बीत गया साल, एक बार फिर से, दिवाली आई। 
त्यौहार पर बनायी माँ ने, पकवान और मिठाई। 

जब जब उठाई वो चिमटा, कड़छी या कड़ाही,
बेटा घर पर नहीं पर्व पर, अतिशः याद सताई। 

संग में होता वह भी तो कितना अच्छा होता,
सोच रही थी टंगी तस्वीर पर टकी लगाई। 

घर होता, खुश हो हो कर खाता, दीप जलाता
यादों में डूबी, बैठी वो घर, आँखों से नीर बहाई। 

पुत्र डटा है सीमा पर, हम मना रहे हैं त्यौहार!
भारत माँ है सर्वोपरि, मन को अपने समझाई। 

Deep jale

दीप जले, दीप जले
प्रसून के सम ह्रदय खिले।  दीप जले...
चारों और उजियारा छाये,
मन में छुपा अँधियारा जाये,
सबके मन में प्रेम फले।  दीप जले...
स्वार्थ हेतु मिलावट ना करना,
स्वास्थ्य हेतु प्रदूषण से बचना,
निर्बल को भी लगाना गले।  दीप जले...
कलुषित मन ना होने पाये,
उल्लसित होकर पर्व मनाएं,
दुर्भाव, विकार समूल जले।  दीप जले...
जिनके घर रहता अँधियारा,
हो ये परम कर्तव्य हमारा,
उनके घर भी दीप जले।  दीप जले ...


दिवाली में धुँआ ना उड़ाओ यारो।
चहुँ ओर रौशनी फैलाओ यारो।
गैरों के भी तम को भगाओ यारो।
इस तरह दिवाली मनाओ यारो।


साल गया, एक बार फिर से, दिवाली आई
माँ ने बनाई, त्यौहार पर पकवान, मिठाई
जब जब उठाई चिमटा, कड़छी या कड़ाही
बेटा घर नहीं पर्व पर, अतिशः याद सताई
संग होता वह भी तो कितना अच्छा होता
सोच रही टंगी तस्वीर पर टकी लगाई
घर होता, खुश हो हो खाता, दीप जलाता
याद में डूबी, बैठी घर में अश्रु बहाई
पुत्र डटा सीमा पर, हम मना रहे त्यौहार !
भारत माँ सर्वोपरि, मन को फिर समझाई

Wednesday, 28 October 2015

Lado chali gayee

लाडो चली गयी  …

लाडो, क्यों चली गयी, सरहद दे पार
ढूंढदी फिरां ओनु माँ, गली बाजार।
बिस्तर ते गुड्डा, कल्ला ही सोंदा वे
रातां नु माता रोंदी, रहंदी निहार।
ओना दा गुड्डा घर, सूखे नयन रौंदा
अम्मी बहांदी नै, असुअन दी धार।
बिखरे पये नै कुड़ी, वेख तेरे केश वे
नेड़े तू आ जा साडे, देवां संवार।
कित्थे छुपी वे लाडो, रो रो के मैया
हाथां विच कंघा ले, करदी पुकार।
पहला निवाला, केड़े मुह विच पावां
कल्ले उतरदा नईयों, गले हेठार।
खा लित्ते किताबां नु, झिंगुर पढ़ पढ़
कुर्ती रखी वै माँ, सन्दुक विच संभाल।
ओनु पता वी नहीं, कि होंदी सरहद?
खेलत खेलत दिती, कदम उतार।
कैसे पठावां ओनु, आवण दा कागज
कित्थे वै डेरा ओदा? कौण सरकार?

लाडो, क्यों चली गयी, सरहद दे पार

(C ) एस० डी०  तिवारी

लाडो क्यों चली गयी   …

लाडो क्यों चली गयी, सरहद के पार
ढूंढती फिरे है माई, गली बाजार।
बिस्तर पर गुड्डा, अकेला ही सोता
रातों को माता रोती, रहती निहार।
लाडो का गुड्डा घर, सूखे नयन रोता
अम्मी बहाती रोज, असुअन की धार।
बिखरे पड़े हैं,  गुड़िया रे केश तेरे
पास तू आ जा मेरे, दे दूँ संवार।
कहाँ छुपी तू लाडो, रो रो के मैया
हाथ में कंघा ले के, करती पुकार।
पहला निवाला, किसके मुंह में डालूँ
उतर नहीं पाता अकेले गले हेठार।
खा गए किताबें सारीं, झिंगुर पढ़ पढ़
कुर्ती रखी माँ ने, सन्दुक में संभाल।
उसको पता नहीं, क्या होती सरहद?
खेल खेल में उसने दी, कदम उतार।
कैसे पठाउं उसे, आने के कागज


कहाँ है डेरा उसका ? कौन सरकार?

(C ) एस० डी०  तिवारी 

Friday, 16 October 2015

Ganv me jiye



गांव में जिये
अभाव में जिये, मगर भाव में जिये,
जितना मिला, उसी में ताव में जिये।
गांव में जिये।
गगन, पवन, सूरज, और चाँद-सितारे,
खूब मिले, दिल खोल के मिले सारे,
खिली धूप, बादलों की छाँव में जिये।
गांव में जिये।
बाग़ बगीचा, खेत और खलिहान,
खगों के कलरव में गूंजता विहान,
कोयल की कू, काग की कांव में जिए।
गांव में जिये।
हरी धरती, हँसते फूल गमकीन,
उड़ती तितलियों के पंख रंगीन,
बसंत के पसरे हुए पांव में जिए।
गांव में जिये।
बूंदों की रुनझुन, नदी की कलकल,
खिसकती खटिया, टपकती छत,
बारिश के पानी के जमाव में जिये।
गांव में जिये।
गर्मी में झलते बेना, पोंछते स्वेद,
सर्दियों में मखमली धूप की सेंक,
निष्कपट, निर्मल स्वभाव में जिये।
गांव में जिये।
हाथों तोड़े अमरुद, आम फले, 
पगडंडियों पर कोसों पैदल चले,
प्रकृति की सुहानी ठाँव में जिए।
गांव में जिये।
संबंधों की मिठास का करते जतन,
अपनों के वास्ते लुटा दिए तन मन,
रूठे कभी तो मान मनाव में जिये।
गांव में जिये।
सादगी व सरल आव भाव में जिये
बहुत स्वछन्द अपने गाँव में जिये।
अभाव में जिये, मगर भाव में जिये।
गांव में जिये। 

एस० डी० तिवारी