Saturday, 8 August 2015

Bhojpuri -Haiku

भोजपुर बा देश आपन  भोजपुरी बा भाषा
दुआरे  आवे पानी संग पावे भेली व बताशा
मीठी बाटे बोली अइसन कान में घोरे मिस्री
मन के छुए गीत इहाँ क सोहर फगुआ कजरी
गंगा मईया की अंचरा में
भर गईल
दशरथ क घर
किलकारी से

धन्य भईलीं
महतारी कौशिल्या
गोद में राम

भोर से शाम
दशरथ कौशिल्या
पुकारें राम


देहले बाणं
प्राण देइ के वीर
हम्में आजादी

कई देहलं
देश खातिर वीर
शीश अर्पण

वेद पुराण
गूढ़ ज्ञान क खान
देश आपन

अथाह ज्ञान
गीता वेद विज्ञान
देश क थाती

शहीदन क -
मिलल बा तिरंगा
लेइ के प्राण

रखिहा ध्यान
झुका ना पावे केहू
एकर शान

पोखरा खेत
कै देहलस एक
बरिस मेघ

कूद गईल 
गड़ही में मेझुका 
परते बुन्नी

हमरे गांव 
गली में खेवत बा 
सेना का नाव

बहवलस 
खुँसाईल नदिया 
रामू क छान्ह

जाने केकर 
बहा के ले आईल 
बाढ़ खटिया


सास पतोह 
हिल मिल गईलीं
मेला जाये के

चल देहलं
बाबा थरिया छोड़ 
नून तेज बा

हांफ गईल
पोकियावत पप्पू
बाछा के धरे 

पहिर बिट्टू 
गईल गांव घूम्मे 
नया कपड़ा 

रात भईल
हो गईल सुल्लह  
मेहरारू से

आजी लेहलीं 
सबेरही मथनी
मट्ठा तैयार 

बाबा क कुर्सी
दिन भर सेके ले 
जाड़ा में घाम

चला देखीं जा 
उ घरे धुआं नाहीं 
फांका ता नाहीं

रसोई बेला
छत से धुआं नाहीं 
गैस क चूल्हा  

चाचा की कान्हे 
सबेरहीं फरसा  
नरेगा केंद्र 

मुर्गा क बांग 
पहलवान जी क इरफ़ान चाचा क 
ट्रेक्टर स्टार्ट 

टंगा गईलं 
बिजली की खम्भा पे 
सलमान जी 

माई क दुनो 
कपार पर हाथ 
ढील परल 


चढ़ गईल
बिलार छींका पर
बचवा/ लइका भुक्खे

भुला न पावे
माई माथे लगावे
करिया टीका

एक्के रोटी में
पप्पू और पिल्ला क
फरियत बा

रोवत पप्पू
कौवा की चोंच में बा
हाथ क रोटी


गोद ओकर
अबहिनो बा खाली
सातवीं होली

कुल काजर
पोता गईल मुहें
मरलं  हाथ

भूल न पावे
माई माथे लगावे
करिया टीका

एक्के कटोरी
दुनो खात रहलें
पप्पू व पिल्ला

पक्कल आम
पठवलस एगो
चीख के सुग्गा

दौरवले  बा  
घोडा के कुकरौछी
बिना लगाम

जेकरी घरे
अंगना में तुलसी
वैद न आवे

घरे लागल
तुलसी जी क थान
चाय क स्वाद

पड़ोसिन में
सवेरहीं झगरा
पण्डोहा पर

का हेराईल
रतिया क खोजेले
भगजोगनी

बगईचा में
चमकेले तरई
होते अन्हार

जींस में देख
लागलं भुसुराये
बुढऊ बाबा

बाजे लगेले
शिवालय क घंटी
होते भिंसार


गांवें हमरी
पानी की संघें मिले
बतासा भेली

संगीत बरी/सबसे मीठ
भाषा बा भोजपुरी
कान क मिस्री

फाग कजरी
सोहर चैता लोरी
गावे भोज्पुरी


पतई झार
पेड़ कुल उघार
पतझड़ में

बंद हो जाला
कमल में भंवरा
रस क लोभ

गईल जान
माछी क पीयत क
कप में चाय

कुंथत बाणं
बिन्ह देले बा हाडा
फुल्लल मुंह

हवा बजावे
बंशी क मीठ धुन
बँसवारी में

करे लागल
पीपर करतल
हावा चलल

घर में जाला
खुलल बाटे ताला
महीना बाद

पंचन में से
चुप्पे उठ गईलं
हावा खोले के

टाँगल बाटे
आम की पेड़ पर
सोना क रस

बिन घलेली
दुआरे क किरौना
आ के चिरई

बिसतुईया
छोड़ के पराईल
दबल पोंछ


समा गईल
छोट्टी मुट्टी सुरंग
टनन अन्न

बनत बाटे
बैतरणी क नाव
गोदान दे के

गंगा मईया
हमनी क असरा
तोरे अंचरा

जनि अईहा
गरमी में पजरा
बसाले देह


गोईयां मारे
घर की पिछवारे
सिटी अन्हारे

इन्द्र देवता
धो देलन मुफ्त में
क़स्बा हमार

चंपा चमेली
राती बगइचा में
खिल्ले तरई

प्रधानो अब
पावत बाणं स्वाद
परधन क

करिया बानीं
मिठ बोल से प्यारी
कोयल रानी

तबहीं नीक
कौवा मुंह ना खोले
कर्कश बोले

ले जात बानीं
चींटी परवाह के
मरल कीट

ज़ूम गईलीं
गिरल गुर सूंघ
गली क चींटी

हार ना माने
केतनो बेर गिरे
चढ़े में चींटी

बन गईल
मिठाई क चाशनी
चींटी क कब्र

मिल जुल के
चींटी बना देहलीं
भेली क चीनी

गोर मुखड़ा
लगा के सोहे आम
करिया तिल्ली

आम खाये क
घुलाय के चूसे में
दुगुना मजा

आम क आम
संघही मिली छाँह
पेड़ लगा के

पेड़ लगावा
फल की संघे पावा
पुन्य प्रताप

पिये ले पानी
उगले ले अगन
मोर कलम

हाथे सजल
झूलत बा मेहंदी
तीज क झूला

तीज त्यौहार
सावन क फुहार
हिलोरे मन

सावन मास
हावा बहे गावत
गीत कजरी

मनवा मोर
चाहत क कटोरी
कब ले भरी

औरी जगावे
सावन क फुहार
मन क आग

सून सावन
ना अइलं साजन
डँसे के खड़ा

भर गईल
दशरथ क घर
किलकारी से

बाजे लागल
पडोसी क कुकर
झांकत भोर

पड़ल छींटा
उज्जर धोती पर
नारी में गेना

अकेले मोर
गड़ल कई आँख
देखे के नाच

धईले गोहूँ
जामल बोरिया में
चुअत छत

दोनों एक्के में
अंझुराय गईलीं
लौकी करेली

छान्ह के छाँह
कइले बा फैलल
लौकी क बेल

सौ का भईलं
उ खटिया धईलं
देखा का होला

पतोहिया न -
बेटवा त ठीक बा
कान भरेले


तड़के बोले
पडोसी क कूकर
भोर भईल

डाक्टर बोल
जीयते मरलस
दिल में गांठ

जउले रही
नाहीं पनपी प्रेम
दिल में गांठ

लागल नीम
छोट मोट हकीम
घर की पास

खारा सागर
लहर गावे गीत
सुने में मीठ

केतनो बड़ -
मौत ओकर छोट
हो जाय गुंडा

बीत गईल
अनमोल सावन
पी क नौकरी


पचाई खाना
पचा लेव तब्बे त
पेट क बात


चौथो हिस्सा भी
संघे नाहीं चलेला
अर्धांगिनी क

प्यार समेट
देली सूत लपेट
भाई की हाथे

पक्का कै देला
राखी क कच्चा सूत
रिश्ता क गांठ

ताँका

धागा में बान्हे
बहिन क दुलार
भाई क प्यार
पवित्र सम्बन्ध क
बाटे राखी त्यौहार

मोती जइसे
निहुर के उठा ला
टूटल रिश्ता

एगो देखावा
तीन तोहरी ओर
होइ अंगुरी

लड़ के भला
कहवाँ हो पावेला
केहु क भला


दिन दे देला
अपन रोशनी भी
रात खातिर

जय श्री कृष्ण

कृष्णावतार
वासुदेव क कीर्ति
कंस क काल

कान्हा क बंशी
गईया और गोपी
मोहे सब ही

कृष्ण क रास
गोपियन क तृप्त
प्रेम क आस

पाय के नांव
डूबलीं श्रीकृष्ण में
मीरा दीवानी

बना दे काम
कउनो बिगड़ल
कृष्ण क नावं

कृष्ण क लीला
भक्तन के दे देला
सच्चिदानंद

  - एस० डी० तिवारी 


परा गईल
खजुआवत बाणं
काट के मस

कौनो भाषा बा
त उ बा भोजपुरी
सबसे मीठ

ह भोजपुरी
मातृ भाषा हिंदी क
आपन पुत्री

सांझी की बेला
गांव क पगडंडी
गोरु क मेला

चाँद अईलं
सुरुज हेरईलं
खोजे खातिर

गाय क खुर  
उड़ावत बा धूर
गोधूलि बेला

गंगा से मिल 
हो जाला समुन्दर  
गंगा सागर 

**********************

बा जिंदगानी
भोजपुरी क्षेत्र क
गंगा क पानी

आश्रय देली 
करोड़न लाल के 
गंगा मइया

मईल होइ 
माँ होइहं उदास 
गंगा क जल  

चललीं सखी
गुनगुनात गीत
गंगा नहाये

स्वच्छ रखल
हमनी क धरम
गंगा माई के

देह की संगे
मनवो के धो देली
गंगा मईया

पुन्य भी पावा
आत्मा हो जाय शुद्ध
गंगा नहाय


लगाई पार
माई क जयकार
प्रेम से बोला ...

करी जे पाई
सुख और संपत्ति
माई क भक्ति

हम बालक
माँ तोहरी सहारे
तू भव तारे

हमरो नाव
अब पार लगा रे
तू भव तारे

जेकर चाहे
माँ तू भाग संवारे
तू भव तारे

तोरी शरण
माँ कृपा बरसा रे
तू भव तारे 

**************************

ना बुताईल
रावण फुकाईल
रावणी दीया

फिर देखाई
उ केतनो फुकाई
रावणी कला


हरेक साल 
कौवा क भाग जागे 
पितरपख 

पूछे ला कौवा  
बइठल मुंडेर 
के आवत बा

आन्ही का जानी
घमंड में डूबल
फूल क गंध

न होखे साथी
केतनो पुचकारा
मातल हाथी

हवा लागल
हो गईल बादर
बड़ा अवारा

गर्म कपड़ा
संदूक से बहरा
जाड़ा आईल

सुखा के खेत
पहुना बन मेघ  
अईलं घेर 

पीठ खुजावे  
भइंस पगुरावे
बईठ कौवा 

पीछे चलल 
लइकन क गोल 
मदारी वाला 

चिरई आ के
खोजत बाटीं खोता 
कटल पेड़ 

सास गरम 
पतोह झोंक देले  
बेसी ईंधन 

चढ़ गईल
सिकहर बिलार 
बबुआ भुक्खे 

आवत बानं
धईले पायजामा
डोरी टूटल

जाम गईल 
घरे धईले चना  
चुवत छत  

छान्ह की नीचे 
सरकत खटिया 
कई गो छेद

गारी की संघे 
थरिया परसाई 
समधी भाई

भिड़ गईलीं 
देवरान जेठान
घर के पोती  

बाँट लेहलीं 
सास के दे दलान 
पतोह घर  

पानी पियावे
जुम गईल गोल
द्वारे बरात 

लक्ष्मी जी भरें  
दिवाली पर धन 
सबकी घरे   

लक्ष्मी क कृपा
बरसे सब पर  
शुभ दिवाली 

खुद मिठाई 
उनके दा बतासा 
लक्ष्मी के झांसा !

मनावत बा 
भारत में दिवाली 
चीन का लड़ी 

हवा में धुँआ 
मिठाई में जहर 
इहे दिवाली ? 

बहे लागेले 
जुकाम जब होला 
नाक से नदी

कईलीं छेद
मंथरा थरिया में 
जे में खईलीं

मिल्ली  मिठाई 
लइका कुल खुश  
दीया दिवारी 

कीकियात बा 
खिचलस पपुआ
पिल्ला क पोंछ 

एक्के रोटी में  
दूनू क फरियाला 
पप्पू आ पिल्ला

कनई पोत   
रोवत बा बबली 
द्वारे बिछली

नीबू मरीचा 
बन्हाइल चौखटे 
नई दुकान

ज्यों ही देखेला 
भैंसा भड़क जाला  
तानल छाता

ताके दुलहा 
सेरात बा खिचड़ी 
दुचक्का चाही 

बाइक खड़ी 
बिना हवा तेल क 
बेटा बहरा 

बिगार देलं 
गोईडे क जमीन 
असकतीहा 

जुमली चींटी 
साफ करे खातिर 
गिरल गुर 

चललीं चींटी 
परवाह करे के 
मस क लाश 

खेवत बाटे 
पप्पू क बनावल 
नाव के चींटा 

मुस्किया देला
अंधउल क फूल
सुरुज देख

लजाय जाला
अढ़उल क फूल
चाँद देख के

नहाय धो  के
मंदिर के चलल
गेना क फूल

नयी गूंथल
छोटी में अटकल
भूसा क कण

सुरुज की संघे
खिड़की से घुसल
भोरे में माछी

खड़ी पानी में
जोहत बाटीं उगे के
सुरुज देव

करत बाट
मिठाई क प्रचार
मिल के हाडा

जुमलं हाडा
अगोरिया करे के
मिठाई पर

दबल पोंछ
छोड़ के पराईल
बिसतुईया

पर्दा हटल
नीचे गिर परल
बिसतुईया

होंठ पाकल
खईला क निशानी
आम पकल

भोर से साँझ
सुरुज के ताकेले
सूरजमुखी

कूद गईल
मेझुका गड़ही में
बुन्नी से बचे

दूसर खन्नी
मूस के बहरियाय
किरअ बिल में

मरीचा तीत
ओहि माटी जामल
ऊख बा मीठ

फेका गईल
कप क कुल चाय
च्यूँटा क टांग

गिरल माछी
चाय की भगोना में
छना गईल

करकट में
भईल भड़भड़
बुन्नी क बाजा

गाडल बाटे
कतलो पर ताके
आलू क आँख

कुक्कुर जात
पोंछ रहलो पर
घुम्मे उघार

यात्री खीचेलं
पहिया पर बैग
ताकेलं कुली

जाने न स्वाद 
आम पर झूलल  
माटा क झोल 

बाटुर योगी 
कय देलं उजार
बसल मठ

पिये ले पानी
उगले ले अगन
मोर कलम

कब्बो कपार 
कब्बो पांव उघार 
छोट रजाई 

सवेर साँझ 
बाबा क जाड़ा बीते  
कउड़ा संगे 

गिरल पारा
घास में छिटाईल 
मोती क दाना

थक्केला नाहीं
सागर क लहर 
देख के मन 

जाले कहत  
नदिया ई बहत  
रुकिहा मत 

जुटल पंच
जइसहीं बरल   
द्वारे कउड़ा 


समेट देले 
कलम पन्ना पर 
पूरा ब्रह्माण्ड 

फेंक के ढेला 
नचा देलं लइका 
झील में चाँद 

सोख घल्लस 
पियासल धरती 
पहिल बुन्नी 

मोर जिंदगी 
कर्जा में बा डूबल 
तब्बो हमार

अनेक पक्षी 
एगो पेड़ कटे त
होखें बेघर

रसोईघर 
मसाला क महक 
मुंह में पानी 

पराग चुरा 
फूलन क चलल 
बसंती हवा

मन के भावे 
बगिया महकावे 
बसंती हवा

कौआ बइठ
खजुआवत बाटे 
भैंस क पीठ

करत बानं
मिठाईन क हाड़ा
पहरेदारी

कय ठो रोटी 
खा घलेलं मालिक 
गिन्ने कुकुर 

भइल स्वाहा 
अपने भष्मासुर 
शिव क माया 

कहे कुंआरी
जय शिव शंकर
सुन्दर वर

प्रेम से बोले
जे जय बम भोले
पूरा हो काम 


गुड क गुण
जीभ पर मिठास
खून बढ़ावे 

रोवाय देले 
अपनी हत्यारा के 
कटत प्याज 

महके जब 
धनिया क चटनी 
बेसी खुराक

चिढेला आलू
ओकर खा घालेला 
करैला चीनी 

लगा लेहलीं 
मनी प्लांट क पौधा 
खर्चा बढ़ल

हमपे रंग
जनि डाला हे कान्हा
भीजे चुनरी

नीक ना लागे
मोहे कउनो रंग
कोरी चुनरी

डलबा रंग
ता देबों हम गाली
कहे ले साली

भीजे चुनरी
ना मारा पिचकारी
मो पे मुरारी

खेलत श्याम
बन के हमजोली
राधा से होली

बाटे मलाल 
ना मललीं गुलाल 
गोरी की गाल 

भावे ना मोहे 
होली क एक्को रंग 
पिया ना संग 

कतहुँ जाई
बगइचा से फूल 
टूट के जाई 

देखेला जब 
भाग जाला अन्हार 
दीया क डर 

खेले के होली 
ले के रंग गुलाल 
चलल टोली 

बचे न पाई 
हर केहु रंगाई 
होली की रंग  

गर्मी क रानी 
पियावे मीठा पानी
लीची दीवानी 

लीची  रानी के 
मुंह से लीहा हाल
टोवें न गाल 


जाड़ा क घाम  
बइठल बुढ़िया  
छिम्मी छीलत 

पाकल आम 
ताकत बा लइका 
ढेला लेइ के    

पाकल आम 
गिरल भदाक से
केकरी मुंहे  

चीख के सुग्गा  
एगो पठवलस
हमके आम  

चलली गोरी  
लगाय के गजरा 
पी के पजरा 

मेंहदी हाथ  
पहिरउली गोरी 
गर में हार 

बुढऊ बाबा 
चल देहलँ खेते 
तान के छाता 

सुत्तिं कइसे 
रात भर खोंखत 
बुढऊ लग्गे  

होत बिहान  
गइया बोलावेले 
दुहे के थान  




राखी क धागा 
जेकरी ना कलाई 
बाटे अभागा 

करेलीं याद
भईया के बहिना
राखी त्यौहार 


खा के मिठाई 
दीदी के उपहार  
राखी त्यौहार

रोली चन्दन 
भईया की लिलार  
रक्षा बंधन 


सुन के धुन 
झूमे पूरा गोकुल 
कान्हा क बंशी 

भईलें धन्य 
देवकी वासुदेव 
कृष्ण क जन्म  

बन के काल 
कंस का उतरल 
कृष्णावतार 

पाय के नांव 
श्रीकृष्ण में डूबलीं 
मीरा दीवानी 

विष पियाय 
पूतना बोलवलीं
आपन काल 

कपारे सुत
लेहले वासुदेव 
नन्द की घरे

गावे सोहर 
जुटलीं मेहरारू 
नन्द की घरे 

यशोदा मग्न 
कोरा में नन्दलाल 
नन्द की घरे 


नीम की छांहें 
पीटेलँ  खलिहर 
तास क पत्ता 

अउते जाड़ा
कमर कस लेलीं 
धुनकी रानी 

शुरू भईल 
कउअन क मेला 
भोज बीतल 

स्वामी खईलँ  
गिनत बा कुकुर 
कय ठो रोटी 

गुर  का ठिल्ला
हाड़न क होत बा 
पहरेदारी  


केहू भी करी
कटी आलू बेचारा
भोज भंडारा

केहू के हाथ
तुरंते थाम ले ला
आलू आवारा

संवार दे ले 
जेकरी इहाँ जा ले
प्याज दुलारी

लइका देख
हरियर सब्जी साग 
सिकोरें नाक

बिका गईल
नैहर का पाजेब
नशा क लत 

भईल खाली 
गुड़िया क गुल्लक 
नशा क लत 

घरे आईल 
बोतल में कलह 
पीये क लत 

ओकरा गर्त 
लउकेला जन्नत 
नशा क लत 

बीबी से होला 
रोजाना तकरार 
नशा क लत 

मुंह क बास 
तोपेलँ पान चबा 
पीये का लत 

गिर गईलें
नारी में एक दिन 
नशा क लत  

परल जब   
छा गईल कंगाली 
नशा क लत 

स्कूल क फीस 
टरल वो महीना 
नशा क लत 

दिल दिमाग 
घरो भईल खाली 
पीये क लत 

चले न पायी
बात की साथ पाक 
भीतरघात 

केहू न जाने 
पढ़ हाथ क रेखा 
भाग क लेखा

पक्का बेशक 
शक बोउला पर 
रिश्ता ख़तम 

मोर अंगना 
तोहरी बिन सून 
गौरैया रानी 

लगाय के उ 
चोर लेहलँ दिल 
जूड़ा में फूल 

फंस गईल 
बोललीं बा सुन्दर 
ओकर बाल 

जी क जंजाल 
निहारे हर कोई 
सुन्दर बाल 

ना गल पायी 
हुस्न की आगे दाल 
उज्जर बाल 

छींक बेहाल 
बा सबकर हाल 
मिर्चा क छौंक 

मक्खन डाल
तड़का वाली दाल
मुंह में पानी 

खाये में और 
बढ़ जाला जायका 
होखे रायता 

बनल खाना 
महतारी की हाथ 
बहुते स्वाद 

पावेले संग 
पालक इतराले 
सोवा क जब 

आलू अवारा
थाम लेला तुरंते 
केहू क हाथ 

केहू की घरे 
जायके खप जाले
प्याज बेचारी 

करेला केहू 
कटे आलू बेचारा 
भोज भंडारा

कहेले कम 
छुपावेले अधिका
मुस्कराहट 

जाड़ा क भोर 
घास पे छीटाईल
मोती क दाना

नहाय धोय 
मंदिर जाये वदे  
फूल तैयार 


आवा खेलीं जा 
हमनी क फगुआ
हे हो बबुआ

खेला तू होरी
ना करा बरजोरी
मोसे कन्हैया

रूठल भौजी
खेले खातिर होली
कहवां जाईं

डाल की पात
बइठल ऊपर
किरौना खात

नाहीं अघात
पालक क पतई 
किरौना खात

*******

हाइकु परिचय (भोजपुरी) 
हाइकु, एगो जापानी कविता क विधा बाटे, जेकर शुरुआत १६ वीं शताब्दी में हो गईल रहे। एगो जापानी कवि बाशो के हाइकु क जनक मानल जाला। हाइकू मात्र सत्रह मात्रा में लिखे जाये वाली सबसे छोटी कविता होले, और संगहीं सारगर्भित भी। एकर लोकप्रियता अउर सारगर्भिता क अनुमान एही बात से लगावल जा सकेला कि आज दुनिया की हर भाषा में हाइकु लिखल जाय रहल बा। 
कुछ विद्वान हाइकु काव्य के विदेशी बताय के आलोचना भी करेलन लेकिन साहित्य के कौनो भाषा, क्षेत्र आ तकनीक के सीमा में ना बान्हल जा सकेला। हम त ई कहब कि जइसे मारुति कार, जापानी हो के भी छोट होखला से हमरी इहां की आम आदमी तक पहुँच बना लेहले बा, वही तरह हाइकु भी आम आदमी तक बड़ी आसानी से पहुँच सकेला। कांहे से कि ऐमे आम आ साधारण बाते के, जवन प्रकृति अउर हमनी के जीवन से जुडल होले, सुन्दर अउर विशेष विधि से कम से कम यानी सत्रह अक्षरों में कह देहल जाला। ई विधि उ कवि लोगन के वरदान बाटे, जे अच्छा भाव, ज्ञान व विचार त रखेला लेकिन छंद बंध करे क क्षमता ना होखला से आपन कविता लिख ना पावेलन। 
हिंदी हाइकु मात्र १७ अक्षर में लिखल जा रहल बा वही तरह से भोजपुरी हाइकु भी सत्रह अक्षर में लिखल जा सकेला।देखे में त लगी कि हाइकु लिखल केतना आसान बा पर लिखे बइठला पर पता चली कि केतना कठिन भी बा। कई बेर त ५ मिनट से भी कम समय में हाइकु बन जाई आ कई बार एक्के हाइकु  लिख्खे में घंटन लग जाला। एकर कारण बाटे एकरा  लिख्खे क कला अउरी सारगर्भित होखल। एगो छोट्टी मुट्टी हाइकु बहुत बड़ बात कहे क सामर्थ्य रखेला अउर साधारण बात के भी अइसन असाधारण तरीका से कह देला जे के पढ़ के पाठक रोमांचित हो जाला अउर एगो अलगे आनंद क अनुभूति करेला। .
हाइकु में मात्र १७ अक्षर के, तीन पंक्ति में बाँट के, आपन विचार प्रकट करे के होला। एमे कौनो दृश्य विशेष या बिम्ब के दर्शावे के होला। एतना कम अक्षर में बिम्ब प्रस्तुति की संगें रचना के रुचिकर भी रखे के होला, जवन कि एगो कठिन काम बा। काहे से कि एमे कवि आपन पूरी बात विस्तार से ना कह पावेला। हाइकु लिखल गहीर सोच, अध्ययन अउर अभ्यास क परिणाम होला। हाइकु लिखे वाला केहू भी अपना के पूरा पारंगत ना कह सकेला। 
अपनी कला से हाइकु एगो अपूर्ण कविता हो के भी पूरा भाव देवे में सक्षम होला। हाइकु अइसन चतुराई से कहल जाला कि पाठक आ श्रोता अपने ज्ञान अउर विवेक क प्रयोग कय के ओकरी भाव अउर उद्देश्य के पूरा कय लेला। चूकि पाठक के हाइकु के पढ़े खातिर ओमे पूरा रूप से घुसे के पड़ेला, उ हाइकु से अपने के जुडल अउर आनंदित अनुभव करेला।

हाइकु में कौनो दूगो भाव, विचार, बिम्ब अथवा परिदृश्य के मात्र १७ वर्ण में तीन पंक्ति में, दू या अधिक वाक्यांश में एह तरीका से व्यवस्थित करे के होला कि पहली अउर अंतिम पंक्ति में ५-५ वर्ण अउरी दूसरी पंक्ति में ७ वर्ण होखें। दूनों भाव, विचार या दृश्य के तुलनात्मक रूप से एह तरह से प्रस्तुत कयल जाई कि अलग होय के भी परस्पर सम्बंधित होखें।
उदहारण खातिर एगो हमार हाइकु पढ़ीं जा  -

दाना लेइके // मूस हाथ जोडले // बिल्ली घात में 

येह हाइकु में 'दाना लेइके मूस हाथ जोडले ' एक बिम्ब प्रस्तुत कय रहल बा यानी कि ई पंक्ति मूस की खाये क व्यव्हार प्रतिबिम्बित करत बाटे, अउर ओसे अलगा एगो अउरी बिम्ब हवे 'बिल्ली घात में' ई पंक्ति बिल्ली की भोजन क व्यवहार दर्शावत हवे, यानी कि बिलारो भोजन की जुगत में बा अउर उ भोजन की रूप में चूहिया के देखत बाटे। इहां दूसरका बिम्ब पहिला पर निर्भर हवे, अगर चूहिया ना होइ त बिलरियो घात में ना होइ।

एगो बाशो क बहुते प्रचलित हाइकु देखीं जा -
old pond // a frog leaps in // sound of water

एकर भोजपुरी में रूपांतर कईल हमार हाइकु : पुरान ताल // कुदलस मेझुका // पानी में छप्प

एह हाइकु में एक बिम्ब बा पुरान ताल जेम्मे मेझुका कुद्दल, दूसर बिम्ब पानी में छप्प। इहां पाठक की सामने परिदृश्य उभर के आवत बा कि ताल की पानी में 'छप्प' मेझुका की कुदला क परिणाम हवे।

साधारण तौर पर कहल जाय त, हाइकु तीन पंक्ति क बहुते छोट कविता हवे, जवन सत्रह वर्ण यानि अक्षर में लिखल जाला, अउर जेम्मे दू गो भाव अथवा बिम्ब होला अउरी दूनों बिम्ब परस्पर सम्बंधित होला।

- एस० डी० तिवारी 


लेईं १५ ठो हाइकु।  हाइकु पर लेख अलगा से भेजत बानीं

हवा लागल
हो गईल बादर
बड़ अवारा

गर्म कपड़ा
संदूक से बहरा
जाड़ा आईल

सुखा के खेत
पहुना बन मेघ
अईलं घेर 

पीठ खुजावे  
भइंस पगुरावे
बईठ कौवा 

भईल खाली 
गुड़िया क गुल्लक 
नशा क लत 

बिका गईल 
नैहर का पाजेब 
नशा क लत 

आलू अवारा
थाम लेला तुरंते 
केहू क हाथ 

करेला केहू 
कटे आलू बेचारा 
भोज भंडारा

शुरू भईल 
कुकुरन क मेला 
बीतल भोज 




न होखे साथी
केतनो पुचकारा
मातल हाथी

पीछे चलल 
लइकन क गोल 
मदारी वाला 

चिरई आ के
खोजत बाटीं खोता 
कटल पेड़ 



महके जब 

धनिया क चटनी 

बेसी खुराक

लगा लेहलीं 
मनी प्लांट क पौधा 
बढ़ल खर्चा 

नीक ना लागे
मोहे कउनो रंग
कोरी चुनरी


कुछ और हाइकु 

कहेले कम 
छुपावेले अधिका
मुस्कराहट 

जाड़ा क भोर 
घास पे छीटाईल
मोती क दाना

नहाय धोय 
मंदिर जाये वदे  
फूल तैयार 

पक्का बेशक 
शक बोउला पर 
रिश्ता ख़तम 


पाकल आम 

ताकत बा लइका 
लेइ के ढेला     

चीख के सुग्गा  
एगो पठवलस
हमके आम  

- एस० डी०  तिवारी 

Friday, 7 August 2015

Haiku August 15 / dil / bharat / desh / chinti / rakhi /soch


देकर मिली
आजादी अनमोल
प्राणों की बलि

उठाये रखी
ऊँचा राष्ट्र मस्तक
वीरों की बलि

हो के शहीद
किये राष्ट्र की रक्षा
कोटि प्रणाम

खो के अपनी
देते सैनिक हमें
चैन की नींद

तुम्हारे हाथ
सम्हालो नौजवान
देश की शान

तू है संतति
राष्ट्र तेरी सम्पति
तू ही रक्षक

तुमसे मात्र
सुरक्षित है राष्ट्र
सैनिक वीर !

चलोगे तुम
मिलाकर कदम
राष्ट्रोन्नयन

हर सपूत
इस मिट्टी ने पाला  
देश का दूत

भीतरघात
करने वालों को भी
देना है मात

लूटे न कोई
जागो हे जन गण
राष्ट्र तुम्हारा

मार भगाओ
शत्रु को पहचान
वीर जवान

जान से प्यारा
है हमको हमारा
भारत वर्ष

राष्ट्र का गान
और राष्ट्रीय ध्वज
हमारी शान

हो न मलिन
राष्ट्र ध्वज का मान
रहे ये ध्यान

शौर्य संस्कृति
प्रगति का प्रतीक
मेरा तिरंगा

मर मिटेंगे
झुकने नहीं देंगे
झंडा तिरंगा

रहा है सज
राष्ट्रीय पर्व पर/पंद्रह अगस्त को
तिरंगा ध्वज

उड़ाता मग्न
स्वतंत्रता दिवस
तिरंगा ध्वज

***********


सीधे हैं वासी
सीधा सादा है वेश
भारत देश

विविध धर्म
जाति क्षेत्र व भाषा
एक है देश

गंगा यमुना
बहें सुचि सरिता
भारत देश

होता सम्मान
चाहे कोई हो धर्म
भारत वर्ष

पावन भूमि
देवी देवताओं की
भारत देश

स्वार्थ निहित
मुट्ठी भर वे लोग
बांटते देश

भरे विविध
प्राकृतिक सम्पदा
भारत देश

सबको लेकर
बढ़ा प्रगति पथ
भारत वर्ष

शांति का दूत
बना पूरे विश्व का
भारत देश 
***********
तुम्हारी माँ सी
तुमको जो पालती
होती है माटी

खुद की आग
जला के कर देगी
पाक को खाक


भिन्न कानून
जाति धर्म क्षेत्र के
भारत एक

गंगा कावेरी
लहराती चुनरी
भारत माँ की

अमर होते
तिरंगे में लिपट
जग छोड़ते

धरे उत्कर्ष
शांति व संस्कृति का
भारत वर्ष


है पुकारती
पुत्रों को माँ भारती
रखना आन

तुम सो रहे
कुछ स्वार्थी हो रहे
हड़पने को देश
कठपुतली
हो जाय ये कुछ की
जागो, हे जन गण !

जान की बाजी
लगाते तब पाते
वीर पदक
नेता की भूख सत्ता
ठाट बाट व भत्ता

पुत्र मोह में
हो चुके धृतराष्ट्र
आज के मंत्री

बढ़ चढ़ के
नेता के चट्टे बट्टे
देश को लूटे


रखना डंडा
उड़ न जाये झंडा
हाथ में कस

ले के अनेकों
फहराया तिरंगा
प्राणों की बलि

रखना ध्यान
मलिन ना हो कभी
देश की छवि

देखी दुनिया
है सबसे बढ़िया
भारत वर्ष

पावन भूमि
राम और कृष्ण की
भारत वर्ष

वेद पुराण
रखे अथाह ज्ञान
भारत वर्ष

अशोक चक्र
कहता इतिहास
महा देश का

दिये शहीद
अनेकों बलिदान
रक्षित हम

भागता  जग
परछाई के पीछे
सत्य से परे

पर्याप्त नहीं
तिरंगा फहराना
ताल मिलाना

जन समृद्धि
स्वतंत्रता दिवस
की हो प्रतिज्ञा

पीती है पानी
उगलती है आग
कलम मेरी

तीज त्यौहार
सावन की बहार
मन की पेंग

हाथों में सजी
झूल रही मेहंदी
तीज का झूला

हरी चूड़ियाँ
हरियाला सावन
मन भावन

और जगावे
सावन की फुहार
मन की आग

सूना सावन
आये नहीं साजन
डंसने खड़ा

बुझा ना पावे
विरहन की आग
वर्षा बहार

देख सौंदर्य
सावन इतराता
नहाई धरा

पहनी पृथ्वी
नहा के सावन में
हरे वसन

वसुंधरा का
खिल जाता यौवन
नहा सावन

छोटा कंकड़
हिला देता तालाब
चाँद का नृत्य

बच्चे ने फेंक
हिला दिया आकाश
ताल में ढेला



बनी चाशनी
मिठाई खाने गयी
चींटी की कब्र

हारती नहीं
गिर कर भी चींटी
लक्ष्य पे दृष्टि

एक जुट हो
कर लेतीं चीटियाँ
राह सरल

मुश्किलों में भी
परिश्रम के बल
चींटी सफल

गति से ज्यादा
लक्ष्य महत्वपूर्ण
चींटी की सीख

मरा पतंगा
हो गयीं एकत्रित
गली की चींटी

ले चलीं चींटी
अंतिम संस्कार को
कीट का शव

नन्ही अवश्य
हाथी हेतु हो जाती
चुनौती चींटी

कभी न देखा
अवकाश मनाते
कर्मठ चींटी

नन्हीं बेशक
प्रकृति में रखती
चींटी भी अंश

चींटी के लिए
उतना ही महत्व
चींटी की जान

ले चलीं चींटी
लगाने को ठिकाने
कीड़े का शव

कोई ना हानि
फिर भी लेते लोग
चींटी की जान

देह से भारी
कहे तैरता शव
सांस का बोझ

ताजगी पाई
सावन में धरती
डूब नहाई

पड़ी साड़ी पे
गंदे पानी की छींट
नाली में गेंद

बजाता सीटी
पडोसी का कूकर
हो गयी भोर

तारों के हाथ
आई अगरबत्ती
चाँद के दीया

राका रौशन
रखने का राकेश
लिया है भार

होते जागृत
पढ़ कर कविता
सोये विचार


वर्षा का पानी
नदी चली बटोर
सिंधु की ओर

खारा समुद्र
लहरें गायें गीत
बड़े ही मीठ
मन ले जीत

डर सताता
सूरज छुप जाता
मेघ ज्यों आता 

सिटी बजाता 
पडोसी का कूकर
मुझे जगाता 


चौथा भाग भी
साथ नाहीं चलता
अर्धांगिनी का  

****************

सुर बेसुर
दिल के संगीत में
हंसी बताती

हंसी दर्शाती
उत्तम तार बांधी
दिल की वीणा

सुनते हम
जब रोता इंसान
दिल की तान

हंसना रोना
कहे कित्ती सुरीली
दिल की तान

कित्त्ता भी जाओ
रहोगे दिल में ही
दूर मुझसे

बसाया तुझे
बीमारी बस गयी
दिल में कैसे

आवश्यक है
प्यार करने वाला
दिल भी रखे

जरूरी नहीं
जिससे प्यार करें
दिल भी रखे 

**************

झुका न पाती
चाहे आ जाये आंधी 
सख्त दरख़्त 

हिला देती है
चली हल्की हवा भी
नरम पौध

पता लगाते
कमजोर को देख
हवा का रुख

लड़ीं बिल्लियाँ
बन्दर पाया मौज
हिस्सा का किस्सा

मोती के जैसे
झुक कर उठा लो
रिश्ते जो टूटे

दिखाओ एक
होतीं अपनी ओर
तीन उंगली

लड़ के भला
कहीं कभी हो पाता
किसी का भला

दिन खो देता
अपना भी प्रकाश
पाने को रात  

************

करे सुदृढ़
राखी का कच्चा धागा
रिश्ते की गांठ

करे प्रगाढ़
भाई दीदी का प्यार
राखी त्यौहार

प्यार समेट
दी भाई की कलाई
धागा लपेट

प्यार समेटी
भाई की कलाई मे
सूत्र लपेटी


धागे में बंधा
बहन का दुलार
भाई का प्यार
पावन संबंधों का
है राखी का त्यौहार


प्यार लपेट
कलाई में लपेटी
दीदी ने धागा

हाथ में राखी
मुंह घेवर बर्फी
प्यारी है जीजी  

लेगी सौगात
दीदी बाँध के राखी
भाई के हाथ

राखी त्यौहार
भाई भूल न जाना
दीदी का प्यार

लेकर आई
जीजी राखी मिठाई
ला बांधूं भाई

राखी मिठाई
जीजी लेकर आयी
बंधा ले भाई 

दीदी ने बांधा 
राखी का कच्चा धागा 
सुदृढ़ नाता  


खोला लिफाफा
मिला राखी का धागा
सीमा पे भाई

राखी का धागा
भाई दीदी का प्यार
करे प्रगाढ़

एस. डी. तिवारी

बांधी कलाई
माथे टीका लगाई
दीदी ने राखी

राखी का धागा
जिसके ना कलाई
रहा अभागा

भाई बहन
एक दूजे की याद
रक्षा बंधन

भाई मिठाई
दीदी सौगात पायी
राखी त्यौहार

रोली चन्दन
सजा भाई के माथे
रक्षा बंधन 

भूल न जाना
भाई! दीदी का प्यार
राखी त्यौहार

लेकर आई
जीजी राखी मिठाई
ला बांधूं भाई

राखी का धागा
जीजी भाई का नाता
किया सुदृढ़

करे प्रगाढ़
भाई जीजी का प्यार
राखी त्यौहार

प्यारे भईया
तुझे बांधूंगी राखी
माथे को चूम
जिए तू युग युग
रक्षाबंधन शुभ

मेरी बहना
रहेगा मेरा प्यार
तुम्हारे साथ
खुश रहना तुम
रक्षाबंधन शुभ

रावण जला
दिखाता है फिर भी
अपनी कला

संग संस्कार
पिता पुत्र भ्राता का
मना त्यौहार

साथ जलाई
बाप बेटा व भाई
जली बुराई

अतिथि मेघ
घुमड़ कर आये
भाग्य जगाये

चले ऊपर
निकलना दूभर
बूदों के बाण



Monday, 3 August 2015

Madhushala

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उंढेला पात्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिव्हा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

पिरिशष्ट से

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
- बच्चन


मदिरालय जाने को चलता है घर से जब पीने वाला
मन में ख्वब

घर में अकेली कोसती किस्मत को
नहीं सोचता घरवाला

छीन जाता है बच्चों का निवाला
दिल जला डाला

भोला भला