Tuesday, 28 February 2017

Mahanagar ki shaam

महानगर की शाम

महानगर की शाम

महानगर की शाम का अपना ढंग होता है।

काली रातों में निराला रंग होता है।

जमीन पर सितारे, धुएं में अनंत होता है।

बाजारों में रौनक, होटलों में उमंग होता है। 

ढूंढ रहा कोई किसी का संग होता है।

मायूस! जिसका बटुआ तंग होता है।

 

मन रंगीन हो जाता शाम होने पर,

दोस्त मिल जाते हाथ में जाम होने पर,

भाव होता दाम होने पर,

दुआ सलाम होती काम होने पर,

धाक होती बड़ा धाम होने पर.

किसी को कोई जानता नाम होने पर,

भीड़ जुट जाती झाम होने पर,

दोस्त भी दूर हो जाते, तमाम होने पर।

 

काम के चक्कर में,

आठ दस घंटे की जेल होती।

दिन भर की कैद से शाम को ही बेल होती।

यातायात में सरकती कैब होती।

पल पल बदलती लेन होती।

 

चालन निकाल रही तेल होती।

गंतव्य तक पहुँचने में बुद्धि फेल होती।

 

शाम तलक सबकी हालत,

हो जाती है खस्ती। 

शाम होने पर ही आती थोड़ी चुस्ती।

क्योंकि कहीं महँगी, कहीं सस्ती,

बिकने लगती है मस्ती।

रफूचक्कर हो जाती, दिन भर की सुस्ती। 

अँधेरे में ही रूबरू होतीं, बड़ी बड़ी हस्ती।

किसी की रोती, किसी की किस्मत हंसती।

करने में मौकापरस्ती, कालिख पोत लेती बस्ती।

 

सबके सामने पैसा कमाने का सवाल होता है।

पैसे के लिए, क्या क्या कमाल होता है!

कोई बना दलाल होता है।

कोई चल रहा कुटिल चाल होता है।

कोई डाल रहा फांसने का जाल होता है।

कोई बेच रहा ठगी का मॉल होता है।

पैसे के लिए, पूछो न क्या हाल होता है! 

कोई धरे मोटी खाल होता है।

सही गलत का नहीं मलाल होता है।

 

असल जिंदगी की शुरुआत;

शुरू होती, होते ही रात।

अँधेरा बढ़ने के साथ,

महानगर की तस्वीर होती अधिक साफ।

 

 

बनाने को अपनी बात

और देने को दूसरों को मात,

लोग लगाने लगते हैं घात।

नहीं हिचकिचाते -

करने में गैरों से भी मुलाकात,

और जाने कैसे कैसे करामात!

 

कुछ ऐसी हो जाती शाम सुहानी,

अजनबी से भी मिलन रूहानी।

जैसे जैसे अँधेरा गहराता है,

देखने में अक्सर आता है,

जुड़ता गजब गजब का नाता है,

मिलने का सिलसिला, दूर तलक जाता है।

 

मेला लग जाता -

जाम छलकाने वालों का,

मन बहलाने वालों का,

झूठी कसम खाने वालों का,

करार की रकम पाने वालों का,

काली योजनाएं बनाने वालों का,

गोरखधंधा चलाने वालों का,

रात की कालिख में

जन, धन, मन काला बनाने वालों का।

 

 

 

नगरी शाम को ही चमकती है,

लाखों बत्तियां जलती हैं,

कहीं पर महफ़िलें सजती हैं,

कहीं पार्टियां चलती हैं,

हुस्न की मंडी सजती है,

घुँघुरु की घंटी बजती है,

कहीं दोस्तों में छनती है,

किसी की चीलम सुलगती है,

जल रही हर बत्ती

कोई न कोई कहानी कहती है।

 

महानगर कभी कहाँ सोता है!

कोई जश्न में, कोई शोक में रात खोता है।

महानगर की शाम का

जो विचित्र चरित्र होता है,

वर्णन करना अत्यंत कठिन,

यहाँ शाम को जो कुछ होता है।

 

¨¨¨

 


- एस० डी० तिवारी


दूध सब्जी 
पप्पू का होम वर्क 
थैला थम 


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