Tuesday, 27 September 2016

Kali si ladaki

काली सी लड़की

घर में छाई पड़ी, पहले से ही कंगाली थी ।
ऊपर से लड़की आई, वो भी काली थी ।
पैदा होते ही कानाफूसी होने लग पड़ी।
काली आ गयी पहले ही समस्याएं बड़ी।
कौन करेगा व्याह, कैसे होगा बेडा पार।
काली कलूटी; कौन बनेगा गले का हार।
पड़ोस की ताई कहने से नहीं चुकती,
ईश्वर अगर लड़की दे तो, दे रूपवती।
काली है, और उस पर रूप की थकान है। 
अपनों के चेहरे पर मुरझाई मुस्कान है। 
घर में कोई ख़ुशी नहीं, सभी उदास हैं। 
फेंक तो सकते नहीं इसीलिए पास है। 
अबोध है, पता नहीं गोरी-काली का भेद।  
बच्चों के साथ बच्चा है, मन में न छेद। 
बड़ी हुई, सनकी जमाना चुप कैसे रहता। 
कोई कलूटी, कोई काली मायी कहता। 
समझ के साथ मुश्किलें बढती रहीं। 
कालापन का अभिशाप सिर चढ़ती रही।  
चुभती रही दुनिया पग पग पर शूल सी।  
वह तो चाहती थी महकना फूल सी।   
दबंगई की छाँव तले ही जीना पड़ा। 
मिलते रहे घाव मगर होंठ सीना पड़ा। 
जो भी नजर पड़ती उसे नीचे ही गाड़ती।  
कोई अपराध किया हो ऐसे निहारती।   
लोगों की बातों से जो गहरी चोट मिलती। 
भीतर घुस छैनी सी आत्मा को छीलती। 
सोचती, यौवन में कौन उसका नाम लेगा। 
जिंदगी थम जाएगी या कोई थाम लेगा। 
राम, कृष्ण भी मानव रूप में सांवले थे। 
मगर सीता और राधा के रंग धवले थे। 
बार बार सोचती इसमे उसका क्या दोष। 
वातावरण देख मन में कई बार उठता रोष।  
ज़माने का बोझ उसके जीवन पर था। 
अपनों का ही दिया कष्ट मन पर था। 
यह कोई अवगुण नहीं, मगर ढकेगी। 
तन के रंग का आवरण गुणों में ढूंढेगी।  
अनेकों यत्न कर, बदन को सँवारी। 
लाभ न मिला तो अपने भीतर निहारी। 
फिर क्या था ! अपने आप को पहचान लिया।  
अपनी लेखनी के प्रवाह को जान लिया।  
बुद्धि, विवेक में औरों से कहीं आगे थी। 
जीवन के सपनों को लिए वह जागे थी। 
उसकी लेखनी का जादू इस तरह छाया। 
अपनी रचनाओं को शिखर तक पहुँचाया।  
अपने सुन्दर कंठ से जब वह गाती थी । 
व्यंजन बनाना बाएं हाथ का खेल था। 
उसके हाथ के स्वाद का ना कोई मेल था। 
सुरीले गान से कोयल भी लजाती थी। 
यही सब सोचते, करते वह बड़ी हुई। 
अब तक तो अनेकों गुणों से जड़ी हुई। 
वह पूर्ण रूप से तराशा हुआ नगीना है। 
उमंग व गौरव से भरा उसका जीना है। 
अब तो वही लोग कहते हैं रूप रंग क्या !
गुणों में ही होती है; वास्तविक सुंदरता। 


एस० डी० तिवारी  

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