कोई न पढ़ा होगा, जितना पढ़ गए, सर्वेश चंदौसवी।
सोनार जैसे गजलें कमाल गढ़ गए, सर्वेश चंदौसवी।
'लफ्जों के समुन्दर' को खंगाल कर जब उड़ेला उन्होंने,
एक सौ उन्नीस किताबों में मढ़ गए, सर्वेश चंदौसवी।
'सम्मानों की, एक लम्बी सी कतार है, 'तेरे ही दम से'
लिम्का बुक में भी नाम अपना जड़ गए, सर्वेश चंदौसवी।
'वक्त का खाका' खींचा, 'चाँद को टांक दिया' जमीं से,
क्या पड़ी? सातवें आसमां पे चढ़ गए, सर्वेश चंदौसवी।
महफ़िलों में बड़ी कदर थी, दिलों में उनके लिए जगह थी,
'मुहब्बत का ख्वाब' दिखा क्यों बिछड़ गए? सर्वेश चंदौसवी।
चलायी जब कलम तो 'उजालों की तस्वीर' को उकेरा,
'धूप का चेहरा' सामने हमारे कर गए, सर्वेश चंदौसवी।
'ख़ुशी की लौ' 'देव', जलाये रखे हम 'महकते अँधेरे में'
हमारे बीच से, कैसे फिर कढ़ गए! सर्वेश चंदौसवी।
- एस. डी. तिवारी
प्रोफेसर डॉ. सीताराम के पवार
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी और हिंदी साहित्य तथा शिक्षा को समर्पित प्रोफेसर सीताराम के पवार ने हिंदी के विकास व उन्नयन के लिए जो अद्वितीय कार्य किया है, उसे वर्षों तक याद रखा जायेगा। प्रोफेसर सीताराम पवार बालपन से ही एक मेधावी छात्र थे। उनका पालन पोषण एक साधारण परिवार में होने के पश्चात् भी वे अपने परिश्रम और माँ के आशीर्वाद के फलस्वरूप सफलता के सोपान चढ़ाते गए। जहाँ उन्होंने अपने शोध कार्यों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया वहीं सैकड़ों छात्रों को शोध में मार्गदर्शन करके पी. एच. डी. की उपाधि दिलवाये ।
विद्यार्थी काल से ही पढ़ने के साथ पढ़ाने की लगन थी।पढ़ने वाले छात्रों की विशेष मदद करने की प्रवृत्ति मन थी।
डॉक्टर पवार का जीवन संघर्ष व अभावों के बावजूद निरंतर सीखने और सिखाने की प्रक्रिया रहा है। जमीनी स्तर पर शिक्षा का प्रसार करना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रहा है। शिक्षा के प्रसार के लिए गांव गांव तक जाना और हिंदी शिक्षा के लिए जन जन को जागरूक करना उनके जीवन का लक्ष्य रहा है। वे राष्ट्रीय बंजारा प्रोफेसर संघ और भाषा संगम जैसे संगठनों के माध्यम से सामाजिक और भाषाई जागरूकता के लिए भी समर्पित रहे हैं।
मार्गदर्शन से अनगिनत क्षात्रों का कल्याण किये, प्रोफेसर पवार।
संघर्ष पूर्ण जीवन जीकर भी अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे,
अपने विवेक और साहस से चुनौतियाँ पार किये, प्रोफेसर पवार।
प्रोफेसर पवार का जन्म कर्णाटक के विजय नगर में हुआ, और वे वहीं अपने भविष्य को तलाशने व तराशने लगे। उनके शिक्षा और शोध के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण है कि उन्होंने कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ में हिंदी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर के रूप में लंबी सेवा दी है।
विश्वविद्यालय के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों प्रबंधन उनके हाथ में रहा, जिनमें छात्र कल्याण विभाग (Director, Students Welfare) , मुद्रण विभाग (printing press ) और दूरवर्ती शिक्षा विभाग (Department of Distance Learning) प्रमुख हैं।
वे लोक सेवा आयोग के मूल्यांकनकर्ता और विभिन्न विश्वविद्यालयों के 'बोर्ड ऑफ अपॉइंटमेंट' (BOA) व 'पाठ्यक्रम विकास समितियों' के सक्रिय सदस्य रहे हैं।
कई राष्ट्रीय संगठनों के नामित सलाहकार हुए, प्रोफेसर पवार।
कर्णाटक प्रदेश में जन्मे, भाषा व साहित्यिक यात्रा करते,
हिंदी तथा कन्नड़ विकास व उन्नयन के आधार हुए, प्रोफेसर पवार।
एक बहुभाषी साहित्यकार के रूप में उनका कार्य केवल हिंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने हिंदी, कन्नड़, मराठी और उर्दू साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन भी किया है। उनके निर्देशन में अनेक शोधार्थियों ने पीएच.डी. (Ph.D.) और एम.फिल. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं।
उनके संपादन और लेखन में 'समकालीन भारतीय साहित्य: विमर्श', 'समकालीन हिंदी साहित्य: किसान एवं श्रमिक जीवन संघर्ष' सम्मिलित हैं। उनकी रचनाओं में त्रिवेणी के साहित्य का विवेचनात्मक अध्ययन, कबीरदास के दार्शनिक विचार, हिंदी और कन्नड़ साहित्य के सन्दर्भ में साहित्य मंथन, स्वत्रंतोत्तर हिंदी और कन्नड़ उपन्यासों में दलित संवेदना जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं।
वे भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों (जैसे खान मंत्रालय) की हिंदी सलाहकार समितियों के नामित सदस्य के रूप में तथा गृह मंत्रालय के अंतर्गत हिंदी राजभाषा के सलाहकार मंडल के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएँ देते रहे हैं। तथा भारत सरकार के उच्च शिक्षस विभाग के सदस्य के रूप में सक्रिय रहे हैं।
डॉ. एस. डी. तिवारी
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