Thursday, 4 June 2015

Unaki mashahoori


किसी को खंजर, किसी को छुरी ने मारा। 
हमको तो बस उनकी मशहूरी ने मारा। 

उनका महफ़िलों में जाना जरूरी ने मारा। 

दूरी कस्तूरी मगरूरी जरूरी मजबूरी पूरी शरूरी मजूरी दस्तूरी लंगूरी 


मशहूरी ने उनकी, हमकोबेगाना बना दिया।
उनको तो मगर ज़माने का, नजराना बना दिया। 

हो गए मसगूल वो तो, अपने फन में कुछ ऐसे; 
उन्हेंउनकी फनकारी का, दीवाना बना दिया।

गुजरे हुए वक्त ने उनको, मशहूर किया इतना;
मेरी मुद्दत की उल्फत को, बचकाना बना दिया।

जब जब भी वो आये, लगा हवा का झोंका आया, 

मौसम हमारे घर का बहुत, मस्ताना बना दिया।  

पहले तो धर लेते थे हम, कहीं से डोर उनकी;
उनको कटी पतंग सी अब, ये जमाना बना दिया।

घूमते रहे पीछे-पीछे, हम तो महफ़िल-महफ़िल;
उन्होंने महफ़िलों का हमें, परवाना बना दिया।


ढूंढते रहते हैं उन्हें अब, बीमार दिल को लिए;
यूँ लगता है उनको मेरा, दवाखाना बना दिया


अब हमारे ही केवल हैं वो, कैसे कहें हम देव!
गैरों में फन की दाद ने तो, ठिकाना बना दिया।


गए जब कहीं पर, हुनर को अपने दिखाने
तूफानों से घिरा मेरा आशियाना बना दिया। 








जो राह में यूँ ही चलते हैं, वो राही हैं, दोस्त कहाँ हैं !
जो कुछ दूर तक साथ चलें, हमराही हैं, दोस्त कहाँ हैं !
राह चलने और वादा करने से, दोस्त नहीं मिला करते,
हाथ पकड़ के साथ चले, तो ही जानें, दोस्त कहाँ है !

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